Rahiman some patience, there’s always hope; Every one perishes, sinner and the Pope!

दर्द-ए-दौर-ए-ज़माना है, थोड़ा धीरज रखो!
वो भी इतना पुराना है, थोड़ा धीरज रखो!

अंधेर मची रहती है, अन्धों की बस्ती में,
तिस पे राजा काना है, थोड़ा धीरज रखो!

यां पीपल के पेड़ों पर आमों का झुरमुट है,
रिपब्लिक ही बनाना है, थोड़ा धीरज रखो!

चुन-चुन कर भेजा है, चुन-चुन घर भेजेंगे,
चुनाव भी तो आना है, थोड़ा धीरज रखो!

दिल्ली की सर्दी में, जम जाती हैं तक़दीरें,
जो वो लोहा पिघलाना है, थोड़ा धीरज रखो!

सियासत के कोल्हू में अन्ना हो गन्ना हो,
उन्हें पिरते जाना है, थोड़ा धीरज रखो!

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Khurshid. A Ghazal.

तपिश में देर तलक तड़पे तेरी दीद को,
फिर लाए हैं वादा-ए-वफ़ा तजदीद को!

चाँद बन कर जो आए सर-ए-बाम तुम,
और चाँद लग गए हैं मेरी ईद को!

इक बुत से फिर उम्मीद है इक शाम की,
ये क्या हो गया है मेरी उम्मीद को!

जिबह होना तो बकरे की तकदीर है,
अम्मा खैर क्या मनाएगी बकरीद को!

जब से सिर पर चढ़ा है, बड़ा सरचढ़ा है,
दिन ढले डूबना है फिर खुर्शीद को!

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तपिश: Heat | दीद: Seeing | तजदीद: Renewal | खुर्शीद: Sun

Whys of Whats

वो पूछते हैं कि क्यों चुप हूँ मैं, हुआ क्या है?
वजह गर जानता तो बता देता कि क्या क्या है!

तुम्हें गरज है फिर तर्क-ए-तआल्लुक ही सही,
हमें हरज है मगर इसमें हमारा क्या है?

वतन आज़ाद हुआ तो कौन सा आबाद हुआ,
वतन-परस्ती का आज़ादी से रिश्ता क्या है?

ख्वाम्खाह तोड़ गए सारे मरासिम हम से,
यही है रस्म तो फिर दिल का तोड़ना क्या है?

सुबह-ए-फिराक है जागें भी तो क्योंकर जागें
सोहबत-ए-शब की सिलवटों में रखा क्या है?

मैं तो इक रात को ताउम्र ओढ़े बैठा हूँ,
तुम्हारे चेहरे पे बरसों का ये पर्दा क्या है?

लगी जो आग तो सब जल गया बचा क्या है
अगर जिंदा है जुस्तजू तो फिर जला क्या है?