Questions and answers

20121111-174642.jpg

You said ask, and
It shall be answered
I’m waiting

What came first?
Question or the answer?
If it was the former, how did you know the latter?
If it was the latter, why did it come later?
If the question has been asked before,
So has the answer been answered?
The question remains
What came first?

You say
In the beginning was the word
Was the word a question?
Or an answer?
Did it mean anything at all?
Does it mean anything at all?

When I asked
What will happen to the lake
By whose shore I swore my love for you?
What becomes of the night
That filled with light the darkest nooks of my heart?
How will the flowers I gifted you
Breathe in the bosom of a history book
Full of deathly intrigues and wars of men
Your answers were quick as lightning
As if you knew them by heart,
As if the answers came first,
And waited for the questions to arrive

You had asked the same questions to yourself
A million times, you had answered them
In my absence, in your mind,
my questions were robbed of their originality,
And wrapped in repetitiveness
They weren’t even questions anymore
There weren’t any answers you gave
What came first now doesn’t matter,
The former or the latter?
Chicken or the egg?

Did it mean anything at all?
Does it mean anything at all?

 

तुमने कहा सवाल करो,
जवाब ज़रूर मिलेगा
मैं इंतज़ार में हूँ

पहले कौन आया?
सवाल या जवाब?
अगर पहले सवाल आया,
तो तुमने जवाब कैसे दिया?
अगर जवाब पहले से मौजूद था,
तो सवाल पहले आया कैसे?
या फिर सवाल पूछा जा चुका था बहुत पहले,
तो फिर जवाब का ही जवाब था सब,
सवाल तो रह ही गया.
पहले कौन आया?

जब मैंने पूछा
कि जिस झील के पानी में
तैरती थी हमारी परछाईं
उस झील को क्या कहूँ जाकर?
क्या जवाब दूँ उस स्याह रात को
जिसने मेरे रूह तक को रौशनी से धोया था?
और वो गुलाब सांस कैसे लेता होगा
मध्यकालीन भारत के इतिहास की किताब में?

तुमने जवाब दिया बर्क की माफिक
और कौंध गई मेरी पूरी दुनिया
मानो जवाब तुम्हारे रटे रटाए थे,
तुम्हारे ज़ेहन की दहलीज पर उबासी लेते
कि मेरे सवाल देर हुई, आए नहीं!

तुमने खुद से भी सवाल वही पूछे थे
हज़ार बार, जवाब दिया था उनका
मैं नहीं था तेरे दिल में जब,
तेरे दिमाग में मेरे सवाल आए थे,
और तुमने छीन लिए
उनका भोलापन, उनकी सादगी,
फिर ज़ख्म-ज़ख्म मेरे सब सवालों को,
अपने जवाबों के तहों में लपेटा था
इस इंतज़ार में कि मैं वही सवाल करूं

मेरे सवाल मेरे सवाल रह ना सके,
उसे जवाब नहीं कहते हैं जो तुमने दिए
पहले कौन आया इससे क्या मतलब
मुर्गी या अंडा, अब किसको तलब!

 

Advertisements

WHOAMI IN HINDI

ये  WHOAMI का भावानुवाद है. पहली बार 3 नवंबरको यहाँ  प्रकाशित हुई थी. अंग्रेजी के लिए यहाँ क्लिक करें

विश्वास!

मान लेना मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं,
जान लेना बहुत ज़रूरी है

तुम्हारी बात मान भी लूं
मैं मानना नहीं चाहता
मैं जानना चाहता हूँ.
तुमपर भरोसा है मुझे,
पर विश्वास कहाँ से लाऊँ!

क्या मैं मुझ को जानता हूँ?
खुद को?
मुझे बताया गया है
कि मैं क हूँ.
कि मैं अमुक साल, महीने, दिन
इस धरती पर आया था,
मैं नहीं था, क नहीं था,
बस एक काया था,
अंदाजा है मुझे,
धुंधला धुंधला,
पांच या छः साल बाद
जब मैं क बनने की कगार पर था.
कोई क पुकारता
तो मैं दौड़ा चला जाता
मेरा नाम हो गया क
फिर पता चला अ-आ
मेरे माता-पिता हैं
कि च और छ मेरे भाई-बहन
मैं मानता चला गया,
अब तो जान भी गया हूँ,
कि जैसा कहा गया वह सत्य है,
कि अ-आ ही हैं मेरे माता-पिता,
कि च-छ से रक्त-सम्बन्ध हैं मेरे

लेकिन मान लो
उन्होंने मुझे ट बुलाया होता तो?
क्या मैं ट होता?
या फिर प, फ, ब, भ, म,
मैं तो क्ष, त्र, ज्ञ भी हो सकता हूँ,
हो सकता है मैं क भी नहीं,
तुम चाहे जो मान लो,
या तुम को जो बताया जाए,
जैसे मुझे बताया गया था,
जो मैं तब से मान रहा हूँ,
पर मैं जानता कहाँ हूँ,
कि मैं हूँ कौन असल में?
जब मैं मैं को नहीं जानता,
तुम्हें कैसे जान सकता हूँ,
तुम पर भरोसा तो है,
पर विश्वास कहाँ से लाऊँ!

No Answers

मेरी जिंदगी इक खुली किताब है लेकिन,
तेरे सवालों का इसमें कोई जवाब नहीं!

मैं जानता हूँ दर्द का मतलब,
हुआ मेरे भी साथ है वही सब,
मगर मेरा ये दर्द मेरा है,
यही इक दर्द है जीने का सबब,
और मर भी जाऊं तो कुछ खराब नहीं!

मेरी जिंदगी इक खुली किताब है लेकिन,
तेरे सवालों का इसमें कोई जवाब नहीं!

तुम्हारे अरमां जहाँ पे क़त्ल हुए,
उसी मकतल में खून मेरा बहा,
वहाँ उस जश्न में सबने देखा,
मगर है कोई जिसने कुछ भी कहा,
तुम्हारा क्या कहूँ मेरा ही कुछ हिसाब नहीं!

मेरी जिंदगी इक खुली किताब है लेकिन,
तेरे सवालों का इसमें कोई जवाब नहीं!

बादे-मर्ग, अब बची है बस एक आरज़ू,
कि जिस तरह बहा है वहाँ मेरा लहू,
वैसे ही किसी और को मरना नहीं पड़े,
ना मुसलसल चले इश्क-ए-दार की ये खू,
मैं तो चुना गया था, ये मेरा इंतखाब नहीं!

मेरी जिंदगी इक खुली किताब है लेकिन,
तेरे सवालों का इसमें कोई जवाब नहीं!