Jashn-e-Aazadi

गैरत गई तो क्या हुआ, टशन चल रहा है
भई अपनी आज़ादी का जशन चल रहा है।

सरहद पे रहने वालो, सर-ए-हद तो जान लो
144 के तहत खूब हुब्ब-ए-वतन चल रहा है।

वतन पे मरने वालों का बाकी निशां ये है
पेंशन के लिए धरना प्रदर्शन चल रहा है।

सच बोलने पे टंगना कलजुग की रवायत है
अभी तो दौर-ए-दार-ओ-रसन चल रहा है।

झंकार बीट आ जाए तो फिर हिट है इबादत
डीजी की धुन पे नात-ओ-भजन चल रहा है।

सोशल नहीं, अंजुमन-ए-तहसीन-ए-बाहमी है
यां तो तुम हसीन और हम हसन चल रहा है।

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साल मुबारक

साल बदला है तो आपको हो साल मुबारक,
हाल बदला नहीं फिर भी बहरहाल मुबारक!
बीता जो साल आपको सालेगा सालों तक,
आया जो साल उसकी नई चाल मुबारक!

आम आदमी को दिल्ली की कुर्सी है मिल गई,
राजनीति में आया जो वो भूचाल मुबारक!

सत्ता के गलियारों में ईमान है उग आया,
स्थाई तो नहीं है पर फिलहाल, मुबारक!

नेता जी की चमड़ी तो दमड़ी से अलग है,
जनताजी को ये मोटी होती खाल मुबारक!

तुम्हें अन्ना के दुधमुंहें सपनों की कसम है,
तगड़ा ना है, लंगड़ा है पर लोकपाल मुबारक!

एक बाबा के सपने ने हमरी नींद उड़ा दी,
खुदाई में जो मिला नहीं वो माल मुबारक!

शिकारी आएगा जाल बिछाएगा दाना डालेगा,
रट रट के जो फंसते हैं उन्हें जाल मुबारक!

रहने को तो हम साथ ही रहते थे, रहेंगे,
दरकार है हर पंछी को इक डाल मुबारक!

ठण्ड है प्रचंड और पीड़ित को मिले दंड,
इस कदर घमंड, भई, कमाल! मुबारक!

दिल तो मुज़फ्फरनगर का रिलीफ कैम्प है,
सुबह टूटेगा पर अभी शब-ए-विसाल मुबारक!

जो सैफई में सेफ है उस वोटबैंक की कसम,
बिलखते बच्चों कों आइटम-ए-पामाल मुबारक!

सावन के अंधों को हरित क्रान्ति से क्या,
ये पीला है, नीला है या है लाल, मुबारक!

जो दिखलाते रहते हैं हर इक को आइना,
उन आइनादारों को तेजपाल मुबारक!

अलाई खा गए मलाई और हम देखते रहे,
कांग्रेस को रह गया है बस मलाल मुबारक!

हेमा के गाल वाली सड़कों को दी उपमा,
बहुत बजाते हैं जो लोग उन्हें गाल मुबारक!

लायक नहीं हैं इसके पर अमला है, बंगला है,
गधों को मिल गया है जो घुड़साल मुबारक!

क्रिकेट का बुखार तो उतरेगा ना कभी,
इस साल वर्ल्ड कप है तो फ़ुटबाल मुबारक!

समानता उपलब्धता पर इस हद तक है निर्भर,
है घर की मुर्गियों को भी अब दाल मुबारक!

रूपए और डॉलर में क्यों बनती नहीं कभी,
हमको भी हो करेंसी में इक उछाल मुबारक!

वादों की लड़ी बन रही है पार्टी दफ्तर में,
गंजों को मिल सकते हैं कुछ बाल मुबारक!

चौदह में फैसला है इस पार कि उस पार,
तब तक आप सब को केजरीवाल मुबारक!

Vodka & Rhyme

Rush to die

Ruled by elected crooks
who book you for writing books,
This is that time,
When speech is a crime,
Get your vodka & lime
And make them rhyme!

Jugni
Jugni kardi press conference,
Kar ke Dilli poora tense,
TV-media in attendance,
Going on total offence,
Bhai mere ae ve Jugni Kejri hai
Scandal di ae treasury hai..

Ho Jugni former bureaucrat,
Anna Hazare ko kar ke set,
AAPe aam, AAPe great,
Poori duniya hui flat,
Bhai mere ae ve Jugni Kejri hai
Ae mulk di ae hi tragedy hai

Balle Balle

Jugni calls it an utter lie,
His charges she does deny,
Loki asking tell us why
Is the tariff touching sky
Phir mere ae ve #Jugni Sheila ae,
Administration bhi te dheela ae!

CAG Audit khilauna ae,
Agle saal to chona ae,
Public ne raula pauna ae,
Je hona hai te hona hai,
Phir mere ae ve #Jugni Sheila ae,
Administration bhi te dheela ae!

Red Sea
Anna proposes
Sonia disposes
#Kejriwal exposes
In really small doses
Bhushan deposes
Bedi just poses
Smelling like roses
Who the F is Moses?

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ये क्या जगह है दोस्तो

तेरी महफ़िल से उठ कर के देखो़, लोग मक़तल में हैं जा बैठे
गोरे गालों से पीछा छुड़ाया काले दिल वाले चलके आ बैठे

हो दुआ अब यही कि दवा का, मरज़ पर असर हो भी जाए
उन मरीज़ों का क्या इलाज हो जो तमरीज़ा से दिल लगा बैठे

दीन-ओ-ईमान सब छीन ले जो, भूख क्या शै है तुम क्या जानो
तुमसे खाने को ही तो मांगा था तूने धोखा दिया सो खा बैठे

दिल-ओ-दिमाग़ पर हुकूमत है करता, पेट कहने को ही मातहत है
घर में चूल्हा जलाने की ख़ातिर लोग लहू क्या घर ही जला बैठे

हर जगह बेबसी का है आलम हर तरफ़ है यही शोर बरपा
क्या करने चले थे जब चले थे, आज पहुंचे यहां कर क्या बैठे

शकल में और अस्ल में और हैं, मुंह में कुछ है बगल में कुछ है
गोल खम्भों के अपने गोल घर में हम किस किस को हैं बिठा बैठे

उसकी ज़ुल्फ़ों का क़ुसूर है सब, दराज़ इतनी अगर ये बहर है
और ख़म इस कदर कि ग़ज़ल का रदीफ़ उठे तो क़ाफ़िया बैठे

Shinde Says

Let’s not harp on… (the) past: Shinde on Pak tour

वो कहते हैं आगे की सोच, पीछे की छोड़.
क्रिकेट से अगर सम्बन्ध सुधरते हैं तो क्या बुरा है?
खेल मे राजनीति मिश्रित ना करें,
“कोई कहीं का खिलाड़ी हो,
भारत में आ कर खेल सकता है.
हम भूतकाल की बातें
वर्तमान में नहीं दुहराना चाहिए
ताकि भविष्य में सम्बन्ध मधुर हो सकें.”
खेल-खेल में ही दो दुश्मन दोस्त हो जाएं,
इस से अद्भुत कुछ ना तो भूत में हुआ
ना होगा भविष्य में.

मंत्री जी शिव सेना तो साम्प्रदायिक शक्ति है,
पर एक बात पर आपत्ति है.
हम भूत को छोड़ भी दें पर भूत हमें छोड़े तो.
और हम भूत पर बात भी न करें भविष्य में?
ये कैसा भविष्य चाहते हैं हम.
और किस भूत को भूलें? और किस को नहीं? और कैसे?

कैसे भूलें कि उस मोटे हाफिज सईद के
दस खिलाड़ी हमें रक्तरंजित कर गए थे,
तीन रात सोई नहीं थी मुंबई,
जो कभी नहीं सोती है,
तब से हर रात रोती है.
कैसे भूलें कि दिल्ली की छाती पर
कई ज़ख्म अभी भी हरे हैं,
और ना जाने कहाँ कहाँ
अभी भी बारूद भरे हैं!
आप भारत का शुक्रिया कहिए,
आप यहाँ के गृह मंत्री हैं,
अमेरिका का कोई मंत्री
९/११ को भूलने की सलाह दे के बताए!
क्योंकि भूलते नहीं हैं वो,
उसकी यादगार बनाते हैं,
उनके जो भी हैं भूत.

हमारे तो और भी हैं भूत,
कैसे भूलें गोधरा में क्या हुआ था,
या उसके बाद पूरे गुजरात में,
१९९२ की अयोध्या को भूल जाएं,
या फिर १५२६ की अयोध्या को,
पंजाब में मरे हिंदुओं को,
या १९८४ में मरे सिखों को,
१९४७ के दंगों को भूल जाएँ,
या ये भी कि हम आज़ाद हुए थे?
अंग्रेजों का दमन भूल जाएं,
या नादिर शाह का आक्रमण!

वैसे तो स्कूल में इतिहास पढ़ाते हैं,
कंठस्थ कराते हैं, ताकि हम भूलें नहीं,
याद रखें, और सीखें.
ताकि हम भूत को जानें,
भूत से डर तभी लगता है,
जब हम भूत को जानते नहीं.
भूत से भागते हैं, भूत भागता ही नहीं,
भूत मित्र नहीं, शत्रु नहीं,
भूत है बस,
भूत का सामना अनिवार्य है,
अगर भविष्य चाहिए.
भूत के बारे में बात करें,
खुल के करें.
शिंदे जी सही कहते हैं,
राजनीति को खेल में मिश्रित ना करें,
शिंदे जी राजनीतिक हैं,
उनकी मजबूरी है
पर ये भी ज़रूरी है कि
राजनीति को भूत में मिश्रित ना करें.
भूत का भभूत मलिए,
फिर भविष्य में चलिए.

Raavan

पेट को रोटी,
तन को कपड़ा,
सिर को छत,
बच्चों की शिक्षा अनवरत,
वादे,
यही हैं जो 47 में हुए,
जो 15 में होंगे!

सबको बिजली,
सबको पानी,
सबको गैस,
गरीबी, बेरोज़गारी हटाओ,
मलेरिया भगाओ,
विदेशी हाथ काटो,
मजदूरों में ज़मीन बांटो,
देश की अखंडता,
संविधान की संप्रभुता,
जय जवान, जय किसान,
और वही पाकिस्तान,
नारे,
यही हैं जो 47 में लगे,
जो 15 में लगेंगे!

आरक्षण, सुशासन,
शोषण, कुपोषण,
मरता जवान,
मरते किसान,
भ्रष्टाचार, कदाचार,
पूँजीवाद, समाजवाद,
अपराध, उत्पीड़न,
सांप्रदायिक सद्भाव,
चीज़ों के बढ़ते भाव,
मुद्दे,
वही हैं जो 47 में थे,
यही हैं जो 15 में होंगे

रावण,
47 में जलाया था,
15 में भी जलाएंगे,
रावण वही है,
रावण जलता नहीं है!