All that is you

नूर-ए-सुब्ह हो मेरे, सुकून-ए-शब हो तुम,
तुम्हें जिस रंग में देखूं गरां ग़ज़ब हो तुम।

मेरे सब ज़ख़्म तुम्हें हंस के दुआ देते हैं,
मेरी सब मुस्कुराहटों के भी सबब हो तुम।

गुलाब, ख़ार, दवा, दर्द, खिजां, अब्र-ए-बहार
मेहर हो, क़हर हो, शाम, सहर, सब हो तुम।

तुम्हारे दश्ते तलब में सराब झिलमिल हैं,
जैसा मैं हूँ क्या वैसे तश्नालब हो तुम?

पलकें जो बंद करूँ तुम ही नज़र आते हो,
मैं तुमसे दूर हूँ पर मुझसे दूर कब हो तुम?

मेरा वजूद है सुजूद तेरे सजदे में
आगे क्या कहूँ कह दिया कि रब हो तुम।

तर्क-ए-तआल्लुक़ का ख़याल अस्ल में तुम्हारा था,
अब तुम ही रोते हो, काकिसी अजब हो तुम!

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नूर-ए-सुब्ह: भोर की किरण | सुकून-ए-शब: रातों का सुकूं | गरां ग़ज़ब: बड़ी गज़ब | ख़ार: कांटे | खिजां: पतझड़ | अब्र: बादल  |

दश्ते तलब: चाह का रेगिस्तान | सराब: मृगमरीचिका | तश्नालब: प्यासा | सुजूद: सजदे की अवस्था | तर्क-ए-तआल्लुक़: रिश्ते तोड़ना

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Cut it!

हमको तुमने दुश्मन जाना, छोड़ो यार!
तुमको कौनसा था याराना, छोड़ो यार!

हो सकता है होना ही इक सपना हो,
जो था वो था भी या था ना छोड़ो यार!

लाख कहा पर पाल लिया आस्तीनों में,
उन साँपों को दूध पिलाना छोड़ो यार!

किसने कहा था रह-ए-इश्क आसां होगी,
बीच रास्ते स्यापा पाना छोड़ो यार!

अहद-ए-मुहब्बत अहल-ए-वफ़ा की बाते हैं,
भैंस के आगे बीन बजाना छोड़ो यार!

खुद को तो तुम रत्ती भर ना बदल सके,
बदलेगा क्या खाक ज़माना, छोड़ो यार!

कतरे-कतरे से तुम हमरे वाकिफ़ हो,
महफ़िल में हमसे कतराना छोड़ो यार!

रौनक-ए-बज़्म-ए-रिन्दां थी चश्म-ए-साकी,
बिन उसके क्या है मयखाना, छोड़ो यार!

पैंसठ साल से राह तकत है इक बुढ़िया,
वादों से उसको बहलाना छोड़ो यार!

चाहें भी तो कैसे भूलें ज़ख़्म सभी,
तुम तो उनपर नमक लगाना छोड़ो यार!

आँख-लगे को रात जगाना छोड़ो यार,
सपनों में यूं आना जाना छोड़ो यार!

Whys of Whats

वो पूछते हैं कि क्यों चुप हूँ मैं, हुआ क्या है?
वजह गर जानता तो बता देता कि क्या क्या है!

तुम्हें गरज है फिर तर्क-ए-तआल्लुक ही सही,
हमें हरज है मगर इसमें हमारा क्या है?

वतन आज़ाद हुआ तो कौन सा आबाद हुआ,
वतन-परस्ती का आज़ादी से रिश्ता क्या है?

ख्वाम्खाह तोड़ गए सारे मरासिम हम से,
यही है रस्म तो फिर दिल का तोड़ना क्या है?

सुबह-ए-फिराक है जागें भी तो क्योंकर जागें
सोहबत-ए-शब की सिलवटों में रखा क्या है?

मैं तो इक रात को ताउम्र ओढ़े बैठा हूँ,
तुम्हारे चेहरे पे बरसों का ये पर्दा क्या है?

लगी जो आग तो सब जल गया बचा क्या है
अगर जिंदा है जुस्तजू तो फिर जला क्या है?