Letters, Words & a Sentence

Life is not a word.
Life is a sentence.
Made of a four-letter word.
Like that.

Death is not a sentence.
Death is a word.
A five-letter word.
Like birth.

Pain is a four-letter word.
Like love. Or life.
Like like.
It’s here. To bear.

God is a three-letter word
Like Sun.
You too have three letters.
Like one.

You become U. To be equal to I.
But that is underspelling.
Truth is I am two letters short.
To become you.

One, two, six, and ten have three.
Three, seven, eight have five.
Nine and five have four.
They meet at four. Therefore.

Advertisements

Pursuit of Happiness

Her absence is the void
The feeling of her absence fills
From corner to corner
Leaving no space
for any feeling else
Her absense is a presence
overwhelming
The absence of joy
isn’t sorrow
Melancholy is
Quest of happiness
The quest born
of the feeling of absence,
not absence itself
_______________________

In pursuit of happiness
Pursuit is the content
happiness just intent
I am loneliness
_______________________

उसके ना होने का एहसास
दिन-रात, शाम-ओ-सहर
ज़हन में रहता है
उसी का घर है
उसके ना होने का एहसास
अगर ना हो
तो बहुत जगह है
हसरतों को कुछ होने के लिए
बहुत ज़मीन है
नए ख़्वाब बोने के लिए

उसके ना होने का एहसास
मुझे इतना है
कि मैं हर वक़्त
उसी की तलाश में हूं
ख़ुशी मेरे हर दुख का सबब है
मैं ख़ुशी की तलाश में हूं।
______________________

होना या ना होना ख़याल है बस
होने ना होने का एहसास हक़ीक़त
______________________

Presence or absence are perceptions
What’s felt is all that’s real
______________________

20121202-210712.jpg

Eternal

bargad

तुम्हारे हिज्र में वैसे तो ग़म-ए-बेहद हूँ
तुम जो आए हो तो आज बहुत गदगद हूँ

सराय है दुनिया जहां से आदमी का
रफ्त जो हुआ मैं हूँ, मैं ही आमद हूँ

गर्दिशें थकें तो करती हैं आराम यहाँ
सुकून के लिए अय्याम का मैं मसनद हूँ

मैं दिलदार हूँ तो अहल-ए-दिल के वास्ते
बेदिली हो तो फिर फ़ितना-ए-आदमकद हूँ

एक डोर हूँ जिसका सिरा कोई भी नहीं
एटर्नल हूँ, सनातन हूँ, मैं तो अनहद हूँ

आवाज़-ए-हक़ को आहनी हुदूद से क्या
बाड़ के बस में नहीं हूं मैं तो बरगद हूँ।

Questions and answers

20121111-174642.jpg

You said ask, and
It shall be answered
I’m waiting

What came first?
Question or the answer?
If it was the former, how did you know the latter?
If it was the latter, why did it come later?
If the question has been asked before,
So has the answer been answered?
The question remains
What came first?

You say
In the beginning was the word
Was the word a question?
Or an answer?
Did it mean anything at all?
Does it mean anything at all?

When I asked
What will happen to the lake
By whose shore I swore my love for you?
What becomes of the night
That filled with light the darkest nooks of my heart?
How will the flowers I gifted you
Breathe in the bosom of a history book
Full of deathly intrigues and wars of men
Your answers were quick as lightning
As if you knew them by heart,
As if the answers came first,
And waited for the questions to arrive

You had asked the same questions to yourself
A million times, you had answered them
In my absence, in your mind,
my questions were robbed of their originality,
And wrapped in repetitiveness
They weren’t even questions anymore
There weren’t any answers you gave
What came first now doesn’t matter,
The former or the latter?
Chicken or the egg?

Did it mean anything at all?
Does it mean anything at all?

 

तुमने कहा सवाल करो,
जवाब ज़रूर मिलेगा
मैं इंतज़ार में हूँ

पहले कौन आया?
सवाल या जवाब?
अगर पहले सवाल आया,
तो तुमने जवाब कैसे दिया?
अगर जवाब पहले से मौजूद था,
तो सवाल पहले आया कैसे?
या फिर सवाल पूछा जा चुका था बहुत पहले,
तो फिर जवाब का ही जवाब था सब,
सवाल तो रह ही गया.
पहले कौन आया?

जब मैंने पूछा
कि जिस झील के पानी में
तैरती थी हमारी परछाईं
उस झील को क्या कहूँ जाकर?
क्या जवाब दूँ उस स्याह रात को
जिसने मेरे रूह तक को रौशनी से धोया था?
और वो गुलाब सांस कैसे लेता होगा
मध्यकालीन भारत के इतिहास की किताब में?

तुमने जवाब दिया बर्क की माफिक
और कौंध गई मेरी पूरी दुनिया
मानो जवाब तुम्हारे रटे रटाए थे,
तुम्हारे ज़ेहन की दहलीज पर उबासी लेते
कि मेरे सवाल देर हुई, आए नहीं!

तुमने खुद से भी सवाल वही पूछे थे
हज़ार बार, जवाब दिया था उनका
मैं नहीं था तेरे दिल में जब,
तेरे दिमाग में मेरे सवाल आए थे,
और तुमने छीन लिए
उनका भोलापन, उनकी सादगी,
फिर ज़ख्म-ज़ख्म मेरे सब सवालों को,
अपने जवाबों के तहों में लपेटा था
इस इंतज़ार में कि मैं वही सवाल करूं

मेरे सवाल मेरे सवाल रह ना सके,
उसे जवाब नहीं कहते हैं जो तुमने दिए
पहले कौन आया इससे क्या मतलब
मुर्गी या अंडा, अब किसको तलब!

 

Reflections

मैं बिम्ब हूँ, ये मेरा प्रतिबिम्ब है
दर्पण में मैं हूँ या कोई मेरे जैसा है?
मैं हूँ तो मेरा दायाँ हाथ उसका बायाँ क्यूँ है?
मैं हूँ, तो आँख उल्टी क्यूँ फड़कती है?

अगर प्रतिबिम्ब है, उल्टा है तो,
सीधा क्यों खड़ा है, सिर के बल क्यों नहीं?
लम्बवत के साथ कोई समझौता नहीं,
दर्पण भी क्षैतिज से ही छल करता है।

दर्पण क्यों करेगा ऐसी ओछी राजनीति?
इसमें उसके कौन से स्वार्थ की है सिद्धि?
हो सकता है दुनिया सारी सिर के बल है,
जो दर्पण में सीधी, ऊर्ध्वत दिखती हो।

तुम मेरे दर्पण हो, मुझको बतलाओ
क्या मेरे क़िस्मत की लकीरें सीधी हैं?
तुम मेरे दर्पण हो, ये सुनते जाओ,
मैं जैसा दिखता हूँ उसके उल़ट हूँ मैं।

स्मृति के दर्पण पर
एक बूँद अश्रु का
दो बूँद जैसा है।
एक बूँद मेरा है,
एक बूँद किसका है?
या दो बूँद एक हुए
स्मृति के उपवन में!

20121111-132427.jpg

WHOAMI!

Belief is not the solution,
knowing is.
I believe you,
But I don’t know you.
How do I have faith?

Do I know I?
Me? Myself?
I have been led to believe
I am X.
I am told I was born at
said dd/mm/yy.
But I was just a body,
I came into being much later,
I have a faint idea,
I must be five or six,
when X came into being.

I started responding to X.
X was my name.
A little later, I learnt
A and B were my parents.
And C & D my siblings.
I believed it all.
Now I don’t believe, but know
A & B sired me,
That C & D are same blood as I,

But what if they had named me
J, Would I be J?
H? or I?
Or P, S, T, U, V, W?
I could be X, Y, Z.
Whatever you believe,
or you’re led to believe,
What I may believe,
I know that I am,
but I don’t know who?
How do I know you?
How do I have faith?

Cool Quotient

(Thanks to long days and no time to think in the last two days, here’s note from last year discovered yesterday. Do react!)

उठो, बाँहें चढ़ाओ,
उफनते हुए सागर के
सीने पे चढ़ जाओ
मत सोचो लहरों की दिशा
अनुकूल है या प्रतिकूल है
अपने बाजू पर भरोसा,
हस्ब-ए-मामूल है तो सब कूल है!

तेरे नख्ली ज़मीं पे ए बागबां,
जो पसीने से सिंचा इक झाड़ है
उसे गले लगा के मुस्कुरा,
चाहे फूल है या शूल है
स्वेद-सिंचित सत्य है,
ये मूल है तो सब कूल है!

एक ही जीवन है, लुट गया,
लुटा दिया,
या फिर यूं ही बिता दिया,
अगली बार बेहतर करेंगे
ये सोचना भी भूल है
पुनर्जनम झूठ है,
ये सच जो मालूम है तो सब कूल है!

कर्म का कोई अर्थ,
कोई उद्देश्य हो, हे पार्थसारथी!
अगर मा फलेषु कदाचन,
तो कर्मण्ये वाधिकारस्ते फ़िज़ूल है,
हाँ दूसरों के फल का लालच नहीं,
ये अगर उसूल है तो सब कूल है

उनकी मूरत हृदय में हो,
सो हृदय ही पत्थर बना लिया,
अब धड़कता नहीं, निर्जीव है, निर्मूल है,
परस्तिश की कसरत करता हूँ,
पत्थर को पसीना आता रहे,
यही पूजा का फूल है, तो सब कूल है!