Sufferings

वो अरसे से हमपे तंतर, मन्तर कर रहे हैं,
अब जाके सारे जन्तर असर कर रहे हैं!

और क्या गुज़रेगी, और क्या गुज़रना बाक़ी है?
जब तक गुज़र रही है गुज़र कर रहे हैं!

शमा की दार पर चढ़ बोला था वो परवाना!
शब-ए-ग़म जाओ, हम एलान-ए-सहर कर रहे हैं,

फिर तेरी याद की आवाज़ से गूंजा है खंडहर,
तुम्हारे बाद के सन्नाटे जहाँ घर कर रहे हैं!

ऐसा रहना भी क्या रहना जहाँ रहने वाले,
या तो मर कर रहे हैं, या डर कर रहे हैं!

बड़े रंगरेज़ थे, चले गए जो अँगरेज़ थे,
ऐसे रंगे हम कि हर को सर-सर कर रहे हैं!

मता-ए-दिल  राहजन की नज़र कर रहे हैं,
ये कैसा सफ़र हम ऐ हमसफ़र कर रहे हैं,

नुक्ता दोनों का सही और मतलब अलग अलग,
तुम सफ़र कर रहे हो, हम सफ़र कर रहे हैं!

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Reasonable Restrictions

बोलने का हक तो है, आवाज़ पे पाबंदी है!
मिज़ाज ये है कि मजाज़ पे पाबंदी है!

हम को मालूम है किस्से का अंजाम मगर,
इन्तेहाँ ये है कि आगाज़ पे पाबंदी है!

हाल-ए-दिल कह भी दें तो किस से कहें,
हमराज़ हैं बहुत, पर राज़ पे पाबंदी है!

हुस्न तो खूब इलाही ने उसे बख्शा है,
शोखी-ए-हुस्न को बस नाज़ पे पाबंदी है!

पर सलामत हैं मेरे, हौसला भी कायम है,
गर इजाज़त ना हो परवाज़ पे पाबंदी है!

ग़ालिबन और थे अंदाज़-ए-बयां ग़ालिब के,
सुर मिलाना है, सो अंदाज़ पे पाबंदी है!

Bazm-e-rang Boomerang

 

 

 

 

 

 

 

जब तलक बज़्म में रौनक आई,
तमाशा बन गए तमाशाई!!

उगा जो शहर तो खामोश है झील,
लवासा तुम हो, मैं धराशाई!

जो अंजलि से काई उछाला करते थे,
उनके दामन पे पड़ गया काई!

उनकी टोपी लगाए फिरते थे,
जिनकी टोपी पर ही बन आई!

जो गाँधी थे आश्रम गए वापस,
ना रास आई उनको रुसवाई!

ना लगे आग, दाग तो लगेगा ही,
साफ़ दामन की हो पज़ीराई,

नित नए राज़ खुलते हैं यहाँ,
चौपट राजा का राज है भाई!

तब्सरा करते रहे आलिम साहिब,
सामईन लेते रहे जम्हाई!

इधर कांग्रेस है, उधर एनडीए,
यहाँ कुआं तो उस तरफ खाई!

 

Rahiman some patience, there’s always hope; Every one perishes, sinner and the Pope!

दर्द-ए-दौर-ए-ज़माना है, थोड़ा धीरज रखो!
वो भी इतना पुराना है, थोड़ा धीरज रखो!

अंधेर मची रहती है, अन्धों की बस्ती में,
तिस पे राजा काना है, थोड़ा धीरज रखो!

यां पीपल के पेड़ों पर आमों का झुरमुट है,
रिपब्लिक ही बनाना है, थोड़ा धीरज रखो!

चुन-चुन कर भेजा है, चुन-चुन घर भेजेंगे,
चुनाव भी तो आना है, थोड़ा धीरज रखो!

दिल्ली की सर्दी में, जम जाती हैं तक़दीरें,
जो वो लोहा पिघलाना है, थोड़ा धीरज रखो!

सियासत के कोल्हू में अन्ना हो गन्ना हो,
उन्हें पिरते जाना है, थोड़ा धीरज रखो!

केजरीवाल के साथ नारे लगाते रहिए!

ज्यों चले काम, अपना काम चलाते रहिए,
खाते रहने के लिए कुछ उनको खिलाते रहिए!

ले-दे के निपट जाए तो हर काम है अच्छा,
ना बने बात तो फिर बात बनाते रहिए!

बिलखते बच्चे के लिए दूध भी नसीब कहाँ,
जम्हूरियत के पालने को हिलाते रहिए!

धूप की धार बड़ी तेज है, लंबा है सफर,
चलिए खुर्शीद को फिर खून पिलाते रहिए!

मर-मर के बनाई है ये मरमर की इमारत,
जो हो सके तो उसमें झाड़ू लगाते रहिए!

जो गुना भाग है अंदर ही अंदर मत गुनिए,
कुछ हमरी सुनिए कुछ हमको सुनाते रहिए!

सबको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
चचा ग़ालिब की तरह दिल को बहलाते रहिए!

 

The Hammam

नंगे हैं हम हम्माम है सारा जहाँ हमारा 

हम्माम में हम सब नंगे,
हर हर गंगे, हर हर गंगे!

स्कैम में घुस गई सिंचाई,
गडकरी पवार मौसेरे भाई,
सब डकारे, डकार ना आई,
डैम, गॉडडैम ना कर पंगे!
लोकतंत्र के रंग बिरंगे!

हम्माम में हम सब नंगे,
हर हर गंगे, हर हर गंगे!

बन्दर बाँट में बन्दर हो लो,
हो सको तो अंदर हो लो,
बहती गंगा में तुम धो लो,
अपने हाथ भी ओ भिखमंगे,
कठौती में है, गर तुम चंगे!

हम्माम में हम सब नंगे,
हर हर गंगे, हर हर गंगे!

Khurshid. A Ghazal.

तपिश में देर तलक तड़पे तेरी दीद को,
फिर लाए हैं वादा-ए-वफ़ा तजदीद को!

चाँद बन कर जो आए सर-ए-बाम तुम,
और चाँद लग गए हैं मेरी ईद को!

इक बुत से फिर उम्मीद है इक शाम की,
ये क्या हो गया है मेरी उम्मीद को!

जिबह होना तो बकरे की तकदीर है,
अम्मा खैर क्या मनाएगी बकरीद को!

जब से सिर पर चढ़ा है, बड़ा सरचढ़ा है,
दिन ढले डूबना है फिर खुर्शीद को!

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तपिश: Heat | दीद: Seeing | तजदीद: Renewal | खुर्शीद: Sun

उन्माद का शंखनाद

आओ. भीड़ बनो, भिड़ जाओ!
खून है अपना, बहाओ,
अपनों का बहाओ, गैरों का बहाओ,
औरों की उमड़ती भावनाओं में
बह जाओ. आओ.

आओ कि धर्म पर संकट है,
धर्मसंकट है या धर्म संकट है.
आओ कि देश खतरे में है
बढ़ती महंगाई है, एफडीआई है,
काली कमाई है,
अपने अपने मुद्दे पसंद करो,
फिर दुकानें बंद करो ,
रास्ता रोको, एम्बुलेंस के टायर जलाओ,
पुतले जलाओ, घरों को आग लगाओ,
किसी कमज़ोर पर हाथ आजमाओ.
आओ. भीड़ बनो. भिड़ जाओ.

राम का नाम है,
हुरमत-ए-इस्लाम है,
अंतिम रात्रिभोज में
जीसस का जाम है,
सब हलाल है, क्या हराम है,
भड़काऊ भाषण है,
पंगु प्रशासन है,
अक्ल पर पानी फिरा है,
शक्ल को तो सुलगाओ,
जो नहीं भड़के हैं,
उनकी भावनाएं भड़काओ,
आओ. भीड़ बनो. भिड़ जाओ.

अलग राज्य के लिए,
या अलग राज्य के खिलाफ,
नहर के पानी के लिए,
या सूखे के चलते आत्महत्या पर
सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ
किसी को आत्मदाह के लिए उकसाओ
या आत्मदाह के विरोध में आ जाओ
टीवी पर बहस कराओ,
उसकी विधवा को चेक थमाओ
फोटो खिंचवाओ.
आओ. भीड़ बनो. भिड़ जाओ.

प्रश्न मत करो,
उत्तर की प्रतीक्षा भी नहीं,
मन की सुनो,
मानस को मारो
मूंछ है तो सब कुछ है,
पूंछ को छिपाए रहो
जानवर थे हम,
जान लो,
जान लो किसी की भी, हड्डियां चबाओ,
इस शहर को जंगल बनाओ
आओ. भेड़िए बनो. भिड़ जाओ.