Sahar

यूं हुआ कि फिर वो बात उम्र भर ना हुई।
हुई जो रात तो फिर रात की सहर ना हुई।

तुम्हारे करम के क़िस्से हैं हर तरफ़ फैले,
ये और बात है हम पर कभी मेहर ना हुई।

हुआ यूं नीमनूर अपनी तमन्ना का चिराग़,
अंधेरी रात में भी ख़्वाहिश-ए-क़मर ना हुई।

मरहम-ए-वक़्त वहम है देखो वक़्त के साथ,
हमारी हालत तो बदतर हुई, बेहतर ना हुई।

तुमसे मिलकर जैसे बेसाख़्ता आई थी ख़ुशी,
फिर और किसी से कभी मिलकर ना हुई।

तुमने छोड़ा तो घटाओं ने बहुत साथ दिया,
ऐसी बरसात किसी से भी बिछड़कर ना हुई।

हमारी दरकिनार हो गईं दुआएं सब
तुम्हारी बद्दुआ ही थी जो बेअसर ना हुई।

तेरी नज़र कभी शबनम तो कभी शोला है
नसीब मेरे ग़ज़ल को सही बहर ना हुई।

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All that is you

नूर-ए-सुब्ह हो मेरे, सुकून-ए-शब हो तुम,
तुम्हें जिस रंग में देखूं गरां ग़ज़ब हो तुम।

मेरे सब ज़ख़्म तुम्हें हंस के दुआ देते हैं,
मेरी सब मुस्कुराहटों के भी सबब हो तुम।

गुलाब, ख़ार, दवा, दर्द, खिजां, अब्र-ए-बहार
मेहर हो, क़हर हो, शाम, सहर, सब हो तुम।

तुम्हारे दश्ते तलब में सराब झिलमिल हैं,
जैसा मैं हूँ क्या वैसे तश्नालब हो तुम?

पलकें जो बंद करूँ तुम ही नज़र आते हो,
मैं तुमसे दूर हूँ पर मुझसे दूर कब हो तुम?

मेरा वजूद है सुजूद तेरे सजदे में
आगे क्या कहूँ कह दिया कि रब हो तुम।

तर्क-ए-तआल्लुक़ का ख़याल अस्ल में तुम्हारा था,
अब तुम ही रोते हो, काकिसी अजब हो तुम!

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नूर-ए-सुब्ह: भोर की किरण | सुकून-ए-शब: रातों का सुकूं | गरां ग़ज़ब: बड़ी गज़ब | ख़ार: कांटे | खिजां: पतझड़ | अब्र: बादल  |

दश्ते तलब: चाह का रेगिस्तान | सराब: मृगमरीचिका | तश्नालब: प्यासा | सुजूद: सजदे की अवस्था | तर्क-ए-तआल्लुक़: रिश्ते तोड़ना

Longing

(To Ibn-e-Insha)

एक तो वैसे ही मुश्किल थी डगर क्या कीजै,
हमसफ़र छोड़ गया बीच सफ़र क्या कीजै।

कि जिसके मुंतज़िर गुज़री ये उमर क्या कीजै,
उसी को नहीं मेरे हालत की खबर क्या कीजै।

असीर-ए-ज़ुल्फ़ हुए जो कभी छूटे ही नहीं
ज़ीस्त गर ज़ुल्फ़ बने ज़ोर-ओ-जबर क्या कीजै।

हमारा फ़र्ज़ था उस दर से दुआ मांगें हम
वो अपने फ़र्ज़ से जो जाए मुकर क्या कीजै।

मात खाई तो अक्ल आई कि इश्क बाज़ी में
काम ना आए अक्ल, ना ही हुनर क्या कीजै।

दुआ-ए-मर्ग दे ऐ चारागर जो देना है
मरीज़-ए-इश्क को दवा औ असर क्या कीजै।

मकीं हुआ है वो रकीब रकबा-ए-दिल पर
अपना ही नहीं दिल अपना अगर क्या कीजै।

साँस सब खर्च के इलहाम हो गर क्या कीजै
माल-ओ-ज़र क्या कीजै, अलमास-ओ-गौहर क्या कीजै।

तौबा भी करते रहे हम हरेक गुनाह के बाद,
फ़रिश्ते उलझन में हैं रोज़-ए-हशर क्या कीजै।

साकिया खुम-ओ-सुबू सब हैं तेरी आँखों में,
हमारे लब ही नहीं ज़ेर-ए-नज़र क्या कीजै।

‘का किसी’ से कहें, सच कह के गए इंशाजी,
सुकूं वहशी को औ जोगी को नगर क्या कीजै।

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मुंतज़िर: इंतज़ार में | असीर-ए-ज़ुल्फ़: ज़ुल्फ़ के कैदी | ज़ीस्त: ज़िंदगी | ज़ोर-ओ-जबर: शक्ति का प्रयोग | बाज़ी: खेल |
दुआ-ए-मर्ग: मरने की दुआ | चारागर: चिकित्सक | मकीं: रहने वाला | रकीब: दुश्मन | रकबा-ए-दिल: दिल की ज़मीन | इलहाम: ज्ञान |
माल-ओ-ज़र: धन-दौलत | अलमास-ओ-गौहर: हीरे-मोती | रोज़-ए-हशर: क़यामत का दिन | खुम-ओ-सुबू: शराब | ज़ेर-ए-नज़र: ध्यान में

Red Bull

रात भर उड़ते रहे यूं मेरे ख्वाब के पर
मुझको भी लग गए हैं सुर्खाब के पर

अपनी रानाई पे गुरूर अच्छा है मगर,
तुमने देखे ही कहाँ हैं उस अजाब के पर

तेरे आरिज़ को यूं छूते हैं गेसू तेरे
समन को छू रहे हों जैसे गुलाब के पर

सुकून-ए-शब है, चांदनी खिली है अभी,
बस थोड़ी देर में लग जाएंगे महताब के पर

झपट्टे मारते चीलों में फँस गया खरगोश,
जंगल से शहर तक फैले हैं तेजाब के पर

हमें पता था सवाल उठाएगा मुझपे वो ही,
के जिसने काट दिए थे मेरे जवाब के पर