Lamb’s Tale

बहुत हुआ कि अब नहीं मेरे सरकार नहीं
यक़ीन तुमपे है तेरे वादों पे ऐतबार नहीं

और कितने बरस होगा इंतज़ार-ए-बहार
इंतहा हो चुकी अब सब्र-ए-इंतज़ार नहीं

हमें तो उज्र है बस हाँ में हाँ मिलाने से
तुम्हारी बात से हमको कोई इनकार नहीं

कभी कभार जो हो जाए खता होती है
मुआफ़ कर दूं गर सताओ बार बार नहीं

सर को छत बदन को वर्क पेट को रोटी
हक़ ये नारों के हक़ीक़त में नमूदार नहीं

मसखरी करता है महफिल में इंतख़ाब तेरा
तुम शर्मिंदा हो पर ज़रा भी शर्मसार नहीं

चमन क्या करे इक गुल के गुलमटे इतने
ग़ुलाम ख़ुशरू के ख़ुशबू के पैरोकार नहीं

दिया हमीं ने हुकूमत का अख़्तियार तुम्हें,
हमारा तुमपे कभी कोई अख़्तियार नहीं?

ये आम राय है ज़ालिम हो मुन्तख़ब रहबर
यही है राह तो फिर हमको करो शुमार नहीं

ज़ुल्म ऐसा कि ख़ुद की सोच जुर्म जैसा है
इल्म इतना नहीं ये इश्क़ है व्यापार नहीं

कितनी तारीक़ हैं ये जुल्मतें जहालत की
कि तालिब भी रोशनी के तलबगार नहीं

तुम्हारी याद के धागों से ख़्वाब बुनता हूं
तेरी क़सम मेरा और कोई रोज़गार नहीं

साकिया हो चुका रिंदों का इम्तिहान बहुत
तेरा ख़ुमार है मय का कोई ख़ुमार नहीं

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Cut it!

हमको तुमने दुश्मन जाना, छोड़ो यार!
तुमको कौनसा था याराना, छोड़ो यार!

हो सकता है होना ही इक सपना हो,
जो था वो था भी या था ना छोड़ो यार!

लाख कहा पर पाल लिया आस्तीनों में,
उन साँपों को दूध पिलाना छोड़ो यार!

किसने कहा था रह-ए-इश्क आसां होगी,
बीच रास्ते स्यापा पाना छोड़ो यार!

अहद-ए-मुहब्बत अहल-ए-वफ़ा की बाते हैं,
भैंस के आगे बीन बजाना छोड़ो यार!

खुद को तो तुम रत्ती भर ना बदल सके,
बदलेगा क्या खाक ज़माना, छोड़ो यार!

कतरे-कतरे से तुम हमरे वाकिफ़ हो,
महफ़िल में हमसे कतराना छोड़ो यार!

रौनक-ए-बज़्म-ए-रिन्दां थी चश्म-ए-साकी,
बिन उसके क्या है मयखाना, छोड़ो यार!

पैंसठ साल से राह तकत है इक बुढ़िया,
वादों से उसको बहलाना छोड़ो यार!

चाहें भी तो कैसे भूलें ज़ख़्म सभी,
तुम तो उनपर नमक लगाना छोड़ो यार!

आँख-लगे को रात जगाना छोड़ो यार,
सपनों में यूं आना जाना छोड़ो यार!

Raavan

पेट को रोटी,
तन को कपड़ा,
सिर को छत,
बच्चों की शिक्षा अनवरत,
वादे,
यही हैं जो 47 में हुए,
जो 15 में होंगे!

सबको बिजली,
सबको पानी,
सबको गैस,
गरीबी, बेरोज़गारी हटाओ,
मलेरिया भगाओ,
विदेशी हाथ काटो,
मजदूरों में ज़मीन बांटो,
देश की अखंडता,
संविधान की संप्रभुता,
जय जवान, जय किसान,
और वही पाकिस्तान,
नारे,
यही हैं जो 47 में लगे,
जो 15 में लगेंगे!

आरक्षण, सुशासन,
शोषण, कुपोषण,
मरता जवान,
मरते किसान,
भ्रष्टाचार, कदाचार,
पूँजीवाद, समाजवाद,
अपराध, उत्पीड़न,
सांप्रदायिक सद्भाव,
चीज़ों के बढ़ते भाव,
मुद्दे,
वही हैं जो 47 में थे,
यही हैं जो 15 में होंगे

रावण,
47 में जलाया था,
15 में भी जलाएंगे,
रावण वही है,
रावण जलता नहीं है!