Confidence Motion

इसमें ड्रामा है, एक्शन है और टोटल इमोशन है,
आज उनके सदन में हमारा कांफिडेंस मोशन है!

ये मोशन लूज़ था अब तक, रहे महफूज़ ये कब तक?
ये सिस्टम है जो शासन का यहां परदे में शोषण है!

विश्वास हो या मत हो, जो हो गर जनता का मत है तो,
है किस बात की प्रॉब्लम, और किस बात की टेंशन है!

ज़िन्दगी चार दिन की है, तो पहले दो ही दिन में दोस्त
दो वादे कर दिए पूरे, अब आगे जो भी अड़चन है!

खाज पावर की ऐसी है खुजाने से नहीं जाती,
इस खुजली के लिए जालिम कोई पाउडर न लोशन है!

मेरे महबूब तेरी महफ़िल में मेरी समझ नहीं आता,
ये अन्दर से खिटपिट है या बाहर से अनबन है!

अगर मैंडेट देना था तो कुछ तगड़ा सा दे देते,
है जन्म से लंगड़ा, और उस पर भी कुपोषण है!

इसके काटे का कहते हैं कि पानी तक नहीं मांगे,
उन्हीं का, या खुदा, हमको भी बाहर से समर्थन है!

सपोर्ट दुश्मन का है, उस पर ये डॉक्टर हर्षवर्धन है,
मरीज़ हैं आप तो फिर आपका मालिक ही भगवन है!

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खीर की आस

मुफ्त का चन्दन, घिसो रघुनन्दन.
हम तो अपनी धुन में गुनगुना रहे थे,
सुनते ही रघुनंदन कुनमुना गए
और हमें ही सुना गए
“भैया मुफ्त की तो मौत नहीं मिलती,
चन्दन कहाँ से मिले?
चूहे मारने का ज़हर भी जेब से बाहर है.”

हमने समझाया भैया ज़हर क्यूँ खाओगे,
जल्दी ही यूपीए की सरकार भोजन की गारंटी दे रही है.
खाद्य सुरक्षा बिल पास हो गया.
प्रणब बाबू का अध्यादेश आ गया है. अब एक रूपए किलो चावल मिलेगा.

“चुनाव आने वाला है क्या?”
राघुनंदन झट से बोले.
हमने कहाँ एक आहट सी तो आई है.
इतने में रघुनन्दन का पारा आसमान पर.
“जब बाकी चीज़ों के दाम आसमान पर होंगे
हमारे पारे की तरह
तो एक रूपए किलो चावल के क्या पकेंगे
खयाली पुलाव के सिवा?”

इतने में बीजेपी के लालजी पधारे
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के चावल के चक्कर में चूक मत जाना,
कमल पर मुहर लगाना
क्योंकि हमारी प्लानिंग है
सबको खीर खिलाने की.

खीर की बात पर
मुंह में आए पानी को
अन्दर ही डिपोजिट कर के
रघुनन्दन जी ने फुल एटेंशन
लालजी की तरफ किया और फरमाया,
“वो कैसे?”

“अरे भाई इस खाद्य सुरक्षा बिल से सांप निकलेगा
और डंस लेगा. इस काटे का इलाज तो मोदी जी भी नहीं कर पाएंगे.”

“सही कहते हो,
नीतीश के काटे का इलाज़ तो कर नहीं पाए,
सांप के काटे का पता नहीं
पानी मांगे ना मांगे.”

“यार बात का फ्लो मत बिगाड़ो.
सुशील-नीतीश तो आस्तीन के सांप निकले.
आस्ते-आस्ते काटा.
पर हम बात तो डेवलपमेंट वाले मोदी जी की कर रहे थे.
उन्होंने गुजरात में अमूल दूध की नदियाँ बहा दी हैं.
नदियों को जोड़ने का तो
भाजपा का प्लान पुराना है.
अब अगर हमारी घाघरा
साबरमती से जुड़ गई
तो घाघरे में दूध होगा.
चोली में चावल.
चीनी तो चीन से सस्ती वाली मंगवा लेंगे.
ग्लोबल वार्मिंग की आंच पर खीर पका लेंगे.”

“झोली में चावल तो सुना था,
तुम चोली में चावल कहाँ से चुरा लाए?”

“चोली-दामन का साथ है,
मोदी का विकास से.
विकास का मोदी से.
जहाँ मोदी हैं, वहां विकास है.
जहाँ विकास है, वहां मोदी हैं.”

हम इस किचाहिन में कूद पड़े.
“वैसे ही जैसे कीचड़ में कमल खिलता है.
जहाँ कीचड़ है वहां कमल है.
जहाँ कमल है, वहां कीचड़ है.”

“कर दी न लीचड़ वाली बात.
भैया, हम कीचड़ में कमल उगाते हैं.
नरेन्द्रभाई भी उगे हैं.
जहाँ-जहाँ देश में पिछड़ेपन का कीचड़ है
वहां-वहां हम नया कमल एक खिलाएंगे.
जो देख नहीं पाते वो कमल ककड़ी खाएंगे.
जैसे गुजरात को चमकाया है, देश को चमकाएंगे.
मौका दोगे तो दिखलायेंगे,”

लालजी चमका रहे थे
या धमका रहे थे,
इसका अंदाजा हम लगा रहे थे
तभी रघुनन्दन फूट पड़े.

“एक मौका दिया था.
चौका लगाया नहीं,
फेर दिया आपने.
भारत को ऐसा चमकाया
कि हमारी आँखें चौंधिया गईं.
कमल का बटन दिखाई नहीं पड़ा.
हाथ की ऊंगली हाथ पर गई.
नौ साल से उसी ऊंगली से उलझ रहे हैं
कि देश के मसले क्यों नहीं सुलझ रहे हैं.”

चुनाव का मौसम है.
उम्मीदवार उम्मीद से होंगे,
हम सब को भी दीद से होंगे.
गाना होगा भाषण होगा,
पोस्टर का प्रकाशन होगा.
हमसे ना रहा गया,
सो हम गमछा झाड़ते-झाड़ते
ये भाषण झाड़ गए.

वोट ना हुआ मुसीबत हो गई.
देना फ़र्ज़ है, सो देते हैं.
फिर आगे उनकी मर्ज़ी जो लेते हैं.
भारी मतों से विजयी बनाओ,
फिर वह आपको पांच साल बनाएंगे.
बनाया रिपब्लिक है,
बनाना रिपब्लिक है,
पब्लिक ही बनती है.
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Irony Man

हे युग पुरुष, युग का अंत हुआ, सूरज के साथ कयाम करो,
जो जुग बीता उसे देखो मत, उगते सूरज को सलाम करो!

तुमको आपत्ति हुई नहीं, कभी लौह पुरुष कहलाने में,
गर्म रहोगे, चोट पड़ेगी, रीत यही है ज़माने में,
तुम बने बहुत कुछ, अब न बनो, बन में जाओ बिश्राम करो!

लोहा लोहे को काटता है, ये टुंडे ठाकुर कह के गए,
तुमसे पहले भी कितने कटे, टुंडे हुए औ रह के गए,
तुम लोहे के चने चबाओ, घर में रहो आराम करो!

लोहा फूलता-फलता है, जब तक चलता है, चलता है,
जंग में खून बहाता है, जंग खाता है, फिर गलता है,
गलता है सो गलत नहीं है, सही को ना बदनाम करो!

किस्मत कह लो लोहे की, इसके दो ठिकाने पुराने हैं,
कारखाने अयस्क गए औ वयस्क कबाड़खाने हैं,
दो खानों में खानाखराब तुम ना आखिरी जाम करो!

जब काम किया तब नाम किया, मौके पे जै श्री राम किया,
राम का नाम लो लाल मेरे, महफ़िल को राम राम करो!

Wrath Yatri

न जाने क्या हुआ है ऐसा, वो हत्थे से छूट गए हैं
रथ के पहिए टूट गए हैं, बालम मोसे रूठ गए हैं!

लाली हो गई कृष्ण सी काली, रंग उड़ गए होश के साथ
हाथों में थे जितने पटाखे हाथों में ही फूट गए हैं!

मातमपुर्सी-ए-इश्क-ए-कुर्सी, लालिहाज़-ए-उम्र-दराजां,
ज़ेर-ए-नज़र जो एक कनी थी अपने ही आकर लूट गए हैं

गुड़गुड़ करते रहे गुरु और, शक्कर हो गए सारे चेले,
किस बेदर्दी से वो ज़ालिम ज़र-ए-उमर को कूट गए हैं

इक टूटे ढाँचे में बिराजे, राम लला ये देख के बोले,
है इतिहास गवाह रे बेटा,  तोड़ने वाले टूट गए हैं!

 

The Common, The Aam

किसी के साथ इनका हाथ। किसी के हाथ इनका साथ। किसी की पार्टी की हैं शान, किसी की पार्टी का हैं नाम। जिनका चिन्ह है अरविंद उनके पुराने हो गए राम, जिसको देखो वही पुकारे जय श्री आम। जय श्री आम। आम चरित मानस की रचना तो कोई नया तुलसी करे पर चरित-रहित राजनीति के मानस का राजा आम है। आज खास नहीं, पेश है एक आम पेशकश।

    आम का नाम बदनाम ना करो

खाने वाले ख़ास हैं, आम है बदनाम है।
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

घर में कोई काट रहा, लोगों में बाँट रहा,
हाथों से दबा दबा पिलपिले को छाँट रहा,
जिसके भी हाथ लगा चूस लिया छोड़ दिया,
रेशे में रस जो बचा घूस सा निचोड़ लिया,
रह गई गुठली सो उसका भी दाम है,
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

हाथों में आम है या आमों का हाथ है,
गिनती ही बतावेगी कौन किसके साथ है,
हरे-हरे आम जाने किसके साथ जाएँगे,
सफ़ेदा ये सोच रहा हम किसको भाएँगे,
केसरिया उलझन में आम नया राम है
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

सीजन शुरू हुआ तो बौराए ख़ूब थे,
आम के किसानों के हौसले मंसूब थे,
मंज़र यूँ बदला कि मंजर नहीं बचे,
फूल कर कुप्पा थे फूल भर नहीं बचे,
मौसम जो करवट ले, किस्सा तमाम है,
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

दागी हुए आमों का कौन ख़रीदार है,
फिर भी ये राजा हैं, इनकी सरकार है,
चुस गए चौसाजी युवा हृदय सम्राट हैं,
कहने को लंगड़े हैं, भागते फर्राट हैं,
तोतापुरी सोच में है, चोंच का ग़ुलाम है।
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

सियासत की फाँस में अल्फांसो फँस गया,
दिल्ली की दलदल में किशनभोग धँस गया,
दशहरी* रोती रही सदर बाज़ार में,
व्यस्त रहा संसद आम के व्यापार में
सिंदूरी जरूर है पर सुबह है या शाम है?
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

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*आम पुल्लिंग है, आदमी की तरह। पर दशहरी यहाँ स्त्रीलिंग हो गया/गई है, बाजार के हवाले से। आम भी वैसे ही लचीला है, आप जैसा समझें।

Kaliyug!

घोर कलियुग

सत्ता में था तो
सिर्फ भूमिका ही बनाई,
विपक्ष में रह कर के
की है सारी कमाई,

मांग थी पूर्ति की,
हाथ की देखो सफाई,
इस बात पे तो इनाम,
मिलना चाहिए भाई!

उल्टी ये दुनिया है,
पीछे ही पड़ गई,
वाड्रा से फिर गई,
और मुझपे गड़ गई!

मैं उद्योगपति नहीं,
सोशल अंतरप्रेन्योर हूँ!
९० प्रतिशत प्योर हूँ,
दस प्रतिशत ही और हूँ!

मेरे कहने पर ही तो,
मेरी जांच कर रहे हैं,
मीडिया वाले फ़ोकट में,
आंच कर रहे हैं!

थोड़ा सा उलटफेर

किसने नहीं किया,
ठेके के बदले फेवर,
किसने नहीं लिया?

इस्तीफ़ा ले लोगे
तुम इत्ती से बात पर,
घोर कलयुग है,
हंसी आती है हालात पर!

Splitting hairs: Bujhe diye mein tel daalte ho miyaan!

हम दाग-दाग हैं तो तुम कौन से शफ्फाक हो,
कौन है जिसका धुलेटी में दामन पाक हो,

नाम है, बदनाम हैं, बेईमानी के इलज़ाम हैं,
हर नए आरोप पर, प्रत्यारोप के इंतजाम हैं,
जो कीचड़ उछालते हैं, उनके अपने काम हैं,

जो तोड़ ना सको तो उनकी बाहें ही मरोड़ दो,
और बात ना बने तो उनपर प्रवक्ता छोड़ दो,

कुछ भौंकने के लिए, कुछ काटने के लिए,
हम पालते हैं, तुम भी पालते हो मियाँ!

यूं उधेड़ोगे तो दोनों ही उधड़ जाएंगे,
क्यों बाल की खाल निकालते हो मियाँ!

नहीं प्रत्यक्ष के, तो अप्रत्यक्ष के अवसाद हैं,
कहीं अध्यक्ष हैं, कहीं अध्यक्ष के दामाद हैं,
जितने किसिम के लोग, उतने किसिम के विवाद हैं,

दुनिया पैसे से चलती है,
बस विपक्ष को खलती है,
सत्ता में हैं,
इसमें हमारी क्या गलती है!

ऐसे चलता है, भविष्य में भी ऐसे ही चलेगा,
नहीं तो लोकतंत्र का विशाल हाथी कैसे पलेगा!