Sahar

यूं हुआ कि फिर वो बात उम्र भर ना हुई।
हुई जो रात तो फिर रात की सहर ना हुई।

तुम्हारे करम के क़िस्से हैं हर तरफ़ फैले,
ये और बात है हम पर कभी मेहर ना हुई।

हुआ यूं नीमनूर अपनी तमन्ना का चिराग़,
अंधेरी रात में भी ख़्वाहिश-ए-क़मर ना हुई।

मरहम-ए-वक़्त वहम है देखो वक़्त के साथ,
हमारी हालत तो बदतर हुई, बेहतर ना हुई।

तुमसे मिलकर जैसे बेसाख़्ता आई थी ख़ुशी,
फिर और किसी से कभी मिलकर ना हुई।

तुमने छोड़ा तो घटाओं ने बहुत साथ दिया,
ऐसी बरसात किसी से भी बिछड़कर ना हुई।

हमारी दरकिनार हो गईं दुआएं सब
तुम्हारी बद्दुआ ही थी जो बेअसर ना हुई।

तेरी नज़र कभी शबनम तो कभी शोला है
नसीब मेरे ग़ज़ल को सही बहर ना हुई।

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