Spaces

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इसी का रोना था
घर बहुत ही छोटा है
एक कमरे का घर नहीं होता
खोली है़, दड़बा है।
बड़े घर का सपना
पूरा हुआ तो अब
बहुत स्पेस है
रोने के लिए।

जो भी मिलता है
वही कहता है
कि मैंने लूज़ किया है
वज़न थोड़ा
या फिर बढ़ गया है
कुछ करो बाॅस
मैं २१ ग्राम का कल भी था
आज भी हूँ।
मैं छोटा हो गया हूँ
बड़ा हुआ है जब से घर।

आदमी और उसके ख़्वाब का घर
दोनों के बीच ख़्वाब भर की दूरी है
अव्वल तो हासिल ही नहीं
हासिल तो रहना मुश्किल
आदम और बाग़-ए-जन्नत के बीच
मुकेश और एंटीलिया के बीच
वही दूरी बनी रहती है
फूस के छप्पर को कंकरीट के ख़्वाब
ग्लास-क्रोम वाले को ग्रीन होम की चाह
कितनी मुहब्बत से मकान घर बनता है
जहाँ से देखते हैं हम नए मकानों को
नींव डालते हैं नए अरमानों के

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The New Black

मिट्टी में मिला दी देश की इज्ज़त,
घर में क्या कम पलीद थी
कि स्विट्जरलैंड में कर दी,
तथाकथित बड़े उद्योगपति,
तथाकथित देश को चलाने वाले,
पार्टियों को जेब में रखते हैं,
कथित तौर पर शासकों पर शासन करते हैं.
सच सामने आ गया ना,
नाक कट गई आखिर.

क्यों किया इतना बड़ा धोखा,
क्यों सिकुड़ा दिया विश्व समुदाय के सामने
जो हमें उभरती मानती थी,
महाशक्तिशाली आर्यावर्त भारत,
उस महाशक्ति के महाशक्ति
और स्विस बैंक में एकाउंट
क्या चला जाता अगर थोड़ा और रखते
१००-२०० करोड़ तो चवन्नी है
इतना तो एक आईएएस दम्पती के
पलंग के नीचे से निकला,
और वो पच्चीस करोड़ किसका था, छी छी,
हमारे दारोगा की जेब उस से गहरी है,
ऐसे खुल्ले के लिए विदेश में एकाउंट
जितना बड़ा नाम, उतना छोटा एमाउंट
औकात बता दी न सबको
कहते हैं जितना व्हाईट है,
उसका दस गुना ब्लैक होता है,
तुम्हारे ब्लैक ने तो मुंह ही काला करा दिया

अब तो हमें दुनिया को दिखाना ही पड़ेगा,
बाकी नामों को भी बाहर लाना ही पड़ेगा
ताकि कल सिर उठा कर कह सकें,
इमानदारी का हाल कुछ खास नहीं पर
बेईमानी तो हम ठीक ठाक करते हैं
उड़ती बात है कुल २५ लाख करोड़ हैं,
इसलिए बाकी का हिसाब भी दो,
भारत माँ को कोई जवाब भी दो!
वो समझेगी दीवाली में भी दिवाला है,
चिंदीचोर हैं सब, फिर भी मुंह काला है,
उसको समझाओ कि माँ घबरा मत
मन काला है, धन भी काला है,
जो केजरीवाल ने निकाला है,
वो कच्चा चिट्ठा है, पक्का नहीं है,
कि हाथी के दांत खाने के और हैं,
खातों में नाम असली है तो काला कैसे
फर्ज़ी नामों से खाते छिपाने के और हैं.