Tunna Tunna

uttara

पानी भीतर प्यासी दुखिया
भुख्या से तो अंतड़ी सुख्या
उड़नखटोले बैठे मुखिया
गुण शुन्ना और नाम बहुगुणा
तुन्ना तुन्ना तक तक तुन्ना!

रुद्रनाथ का रूप प्रचंड है
मानुष को फिर भी घमंड है
प्रश्न अखंड औ उत्तर खंड है
धरती को लग गया रे घुन्ना
तुन्ना तुन्ना तक तक तुन्ना!

राजनीति की हांड में तप के
फेंकू फेंके तो पप्पू लपके
रिस के रिलीफ अगर जो टपके
मिले मलाई चाट ले मुन्ना
तुन्ना तुन्ना तक तक तुन्ना!

जिनको ये लागी लगत हैं
जग सोवत औ हमीं जगत हैं
जड़ भगत, चेतन भगत हैं
जनता को तो लगत हैं चुन्ना
तुन्ना तुन्ना तक तक तुन्ना!

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Irony Man

हे युग पुरुष, युग का अंत हुआ, सूरज के साथ कयाम करो,
जो जुग बीता उसे देखो मत, उगते सूरज को सलाम करो!

तुमको आपत्ति हुई नहीं, कभी लौह पुरुष कहलाने में,
गर्म रहोगे, चोट पड़ेगी, रीत यही है ज़माने में,
तुम बने बहुत कुछ, अब न बनो, बन में जाओ बिश्राम करो!

लोहा लोहे को काटता है, ये टुंडे ठाकुर कह के गए,
तुमसे पहले भी कितने कटे, टुंडे हुए औ रह के गए,
तुम लोहे के चने चबाओ, घर में रहो आराम करो!

लोहा फूलता-फलता है, जब तक चलता है, चलता है,
जंग में खून बहाता है, जंग खाता है, फिर गलता है,
गलता है सो गलत नहीं है, सही को ना बदनाम करो!

किस्मत कह लो लोहे की, इसके दो ठिकाने पुराने हैं,
कारखाने अयस्क गए औ वयस्क कबाड़खाने हैं,
दो खानों में खानाखराब तुम ना आखिरी जाम करो!

जब काम किया तब नाम किया, मौके पे जै श्री राम किया,
राम का नाम लो लाल मेरे, महफ़िल को राम राम करो!

Wrath Yatri

न जाने क्या हुआ है ऐसा, वो हत्थे से छूट गए हैं
रथ के पहिए टूट गए हैं, बालम मोसे रूठ गए हैं!

लाली हो गई कृष्ण सी काली, रंग उड़ गए होश के साथ
हाथों में थे जितने पटाखे हाथों में ही फूट गए हैं!

मातमपुर्सी-ए-इश्क-ए-कुर्सी, लालिहाज़-ए-उम्र-दराजां,
ज़ेर-ए-नज़र जो एक कनी थी अपने ही आकर लूट गए हैं

गुड़गुड़ करते रहे गुरु और, शक्कर हो गए सारे चेले,
किस बेदर्दी से वो ज़ालिम ज़र-ए-उमर को कूट गए हैं

इक टूटे ढाँचे में बिराजे, राम लला ये देख के बोले,
है इतिहास गवाह रे बेटा,  तोड़ने वाले टूट गए हैं!

 

Marham

जब कोई भी नया ग़म मिला है, جب کوئی بھی نیا غم ملا ہے
मेरे ज़ख्मों को मरहम मिला है. میرے زخموں کو مرہم ملا ہے

यूं मिला तो बहुत कुछ बहुत है, یوں ملا تو بہت کچھ بہت ہے
जो कम था वही कम मिला है جو کم تھا وہی کم ملا ہے

तेरी लागर्ज़ी मर्ज़ी है तेरी تیری لاگرزی مرضی ہے تیری
मर्ज़ हमको भी बाहम मिला है  مرض ہمکو بھی باہم ملا ہے

बज़्म-ए-ग़ैरां है हैरां किस शै पर, بزم غیراں ہے حیراں کس شی پر
जब मिला हमको बरहम मिला है جب ملا ہمکو برہم ملا ہے

तेरी आँखों के पीछे जुबां है تیری آنکھوں کے پیچھے جباں ہے
बोलती हैं कोई पुरनम मिला है بولتی ہیں کوئی پرنم ملا ہے

शरबत-ए-हिन्द पूछो ना लज्ज़त  شربت ہند پوچھو نہ لذّت
गंगाजल में आब-ए-ज़मज़म मिला है گنگاجل میں اب زمزم ملا ہے

Banana Republic~ A Poorvi Gazal

Image

सवाल उठता है ये ही ज़हन-ए-पब्लिक मा,
कि ई केला कहाँ से आ गया रिपब्लिक मा!

जो दंगा कर रहे उनसे कोई भिड़ता ही नहीं,
जो दंगा-पीड़ित है उसी को खेंचो झिकझिक मा!

एक ही शॉट में कानून को फुटबाल कीहिश,
गज़ब के दम है अम्मा तोहरे ई किक मा!

चाल मगरिब के तुम देख के क्यों हैरां हउ,
हाल देख लियौ होई यही मशरिक मा!

कर के देखा है जतन हमने वतन खातिर भी
ईमान मुलुक मा है पर नहीं है मालिक मा!

कैसे आएं अगर आएं भी तोहरे महफ़िल में,
हज़ार छेद हुआ पैरहन-ए-आशिक मा!

Forgive

काश तुम देख पाते करोड़ों हाथ
पढ़ पाते लाखों चेहरे,
चेहरों पर आंसुओं की पंक्तियां को
तमतमाते क्रोध के पीछे की याचना
तुम्हारे लिए इंसाफ़ मांग रहे नारों के पीछे
सब मांग रहे हैं तुमसे भीख
हमें माफ़ी दे दो

पुत्रम् देहि की प्रार्थना से लेकर,
पुत्रवती भव के आशीर्वाद तक,
तुम्हारे जन्मते ही माथे पर लकीरों का संचय
तुम्हारे दहेज के लिए धन का
और तुम्हें पराया धन की संज्ञा देना,
हर परंपरा की विकृति का
संज्ञान नहीं लेने के लिए
हमें क्षमा करना बेटी

पहली बार तुम्हें चौक पर
भीड़ में पिसते देख आंख बचाने के लिए
फिर ख़ुद को यह कहने के लिए
कि कौन लड़ता उन गुंडों से
आस-पास राक्षस पलते रहे हम चुप रहे
हम बोले तो दबी जबान में बोले
तुम्हारे बोलने को अनसुना करने के लिए
और इसलिए भी कि हम ने
आज तक माफ़ी तक नहीं मांगी तुमसे
हमें माफ़ कर देना बहन।

तुम्हारी मौत पर सियासत करते हैं
उन निर्लज्जों को भी, जिनके मुंह से
क्षमा याचना नहीं निकलेगी कभी
उनको भी जिन्होंने
तुम्हारी पीड़ा को नक़ली नाम दिया
जिससे वह दर्द दामिनी की अमानत रहे
और भय इतना कि तुम्हें निर्भया कहा
जबकि तुम्हारा नाम था एक।
और है भी
नारी
हमें क्षमा करना

Eternal

bargad

तुम्हारे हिज्र में वैसे तो ग़म-ए-बेहद हूँ
तुम जो आए हो तो आज बहुत गदगद हूँ

सराय है दुनिया जहां से आदमी का
रफ्त जो हुआ मैं हूँ, मैं ही आमद हूँ

गर्दिशें थकें तो करती हैं आराम यहाँ
सुकून के लिए अय्याम का मैं मसनद हूँ

मैं दिलदार हूँ तो अहल-ए-दिल के वास्ते
बेदिली हो तो फिर फ़ितना-ए-आदमकद हूँ

एक डोर हूँ जिसका सिरा कोई भी नहीं
एटर्नल हूँ, सनातन हूँ, मैं तो अनहद हूँ

आवाज़-ए-हक़ को आहनी हुदूद से क्या
बाड़ के बस में नहीं हूं मैं तो बरगद हूँ।

Sahar

यूं हुआ कि फिर वो बात उम्र भर ना हुई।
हुई जो रात तो फिर रात की सहर ना हुई।

तुम्हारे करम के क़िस्से हैं हर तरफ़ फैले,
ये और बात है हम पर कभी मेहर ना हुई।

हुआ यूं नीमनूर अपनी तमन्ना का चिराग़,
अंधेरी रात में भी ख़्वाहिश-ए-क़मर ना हुई।

मरहम-ए-वक़्त वहम है देखो वक़्त के साथ,
हमारी हालत तो बदतर हुई, बेहतर ना हुई।

तुमसे मिलकर जैसे बेसाख़्ता आई थी ख़ुशी,
फिर और किसी से कभी मिलकर ना हुई।

तुमने छोड़ा तो घटाओं ने बहुत साथ दिया,
ऐसी बरसात किसी से भी बिछड़कर ना हुई।

हमारी दरकिनार हो गईं दुआएं सब
तुम्हारी बद्दुआ ही थी जो बेअसर ना हुई।

तेरी नज़र कभी शबनम तो कभी शोला है
नसीब मेरे ग़ज़ल को सही बहर ना हुई।

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The Common, The Aam

किसी के साथ इनका हाथ। किसी के हाथ इनका साथ। किसी की पार्टी की हैं शान, किसी की पार्टी का हैं नाम। जिनका चिन्ह है अरविंद उनके पुराने हो गए राम, जिसको देखो वही पुकारे जय श्री आम। जय श्री आम। आम चरित मानस की रचना तो कोई नया तुलसी करे पर चरित-रहित राजनीति के मानस का राजा आम है। आज खास नहीं, पेश है एक आम पेशकश।

    आम का नाम बदनाम ना करो

खाने वाले ख़ास हैं, आम है बदनाम है।
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

घर में कोई काट रहा, लोगों में बाँट रहा,
हाथों से दबा दबा पिलपिले को छाँट रहा,
जिसके भी हाथ लगा चूस लिया छोड़ दिया,
रेशे में रस जो बचा घूस सा निचोड़ लिया,
रह गई गुठली सो उसका भी दाम है,
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

हाथों में आम है या आमों का हाथ है,
गिनती ही बतावेगी कौन किसके साथ है,
हरे-हरे आम जाने किसके साथ जाएँगे,
सफ़ेदा ये सोच रहा हम किसको भाएँगे,
केसरिया उलझन में आम नया राम है
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

सीजन शुरू हुआ तो बौराए ख़ूब थे,
आम के किसानों के हौसले मंसूब थे,
मंज़र यूँ बदला कि मंजर नहीं बचे,
फूल कर कुप्पा थे फूल भर नहीं बचे,
मौसम जो करवट ले, किस्सा तमाम है,
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

दागी हुए आमों का कौन ख़रीदार है,
फिर भी ये राजा हैं, इनकी सरकार है,
चुस गए चौसाजी युवा हृदय सम्राट हैं,
कहने को लंगड़े हैं, भागते फर्राट हैं,
तोतापुरी सोच में है, चोंच का ग़ुलाम है।
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

सियासत की फाँस में अल्फांसो फँस गया,
दिल्ली की दलदल में किशनभोग धँस गया,
दशहरी* रोती रही सदर बाज़ार में,
व्यस्त रहा संसद आम के व्यापार में
सिंदूरी जरूर है पर सुबह है या शाम है?
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

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*आम पुल्लिंग है, आदमी की तरह। पर दशहरी यहाँ स्त्रीलिंग हो गया/गई है, बाजार के हवाले से। आम भी वैसे ही लचीला है, आप जैसा समझें।

All that is you

नूर-ए-सुब्ह हो मेरे, सुकून-ए-शब हो तुम,
तुम्हें जिस रंग में देखूं गरां ग़ज़ब हो तुम।

मेरे सब ज़ख़्म तुम्हें हंस के दुआ देते हैं,
मेरी सब मुस्कुराहटों के भी सबब हो तुम।

गुलाब, ख़ार, दवा, दर्द, खिजां, अब्र-ए-बहार
मेहर हो, क़हर हो, शाम, सहर, सब हो तुम।

तुम्हारे दश्ते तलब में सराब झिलमिल हैं,
जैसा मैं हूँ क्या वैसे तश्नालब हो तुम?

पलकें जो बंद करूँ तुम ही नज़र आते हो,
मैं तुमसे दूर हूँ पर मुझसे दूर कब हो तुम?

मेरा वजूद है सुजूद तेरे सजदे में
आगे क्या कहूँ कह दिया कि रब हो तुम।

तर्क-ए-तआल्लुक़ का ख़याल अस्ल में तुम्हारा था,
अब तुम ही रोते हो, काकिसी अजब हो तुम!

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नूर-ए-सुब्ह: भोर की किरण | सुकून-ए-शब: रातों का सुकूं | गरां ग़ज़ब: बड़ी गज़ब | ख़ार: कांटे | खिजां: पतझड़ | अब्र: बादल  |

दश्ते तलब: चाह का रेगिस्तान | सराब: मृगमरीचिका | तश्नालब: प्यासा | सुजूद: सजदे की अवस्था | तर्क-ए-तआल्लुक़: रिश्ते तोड़ना