तुमसे ना होगा मेरी जान, रहने दो

बहुत हुआ गुणगान बखान, रहने दो
फलां मॉडल, फलां प्लान, रहने दो!

जन्नत के बदले जमीर का सौदा है
जन्नत के साजो सामान, रहने दो

इन्तखाब में इंतकाम की बात ही क्यूँ
क्या सम्मान, क्या अपमान, रहने दो

दिल काला तो चिट्टी दाढ़ी झूठी है
क्या बाँचो गीता, कुरआन, रहने दो

सपने बेचो, डर बेचो, और क्या बेचो
तुम चाहो बेचो ईमान, रहने दो

भाई भाई के बीच में खाई खोद रहे
रहनुमाई ऐ भाई जान, रहने दो

मिट्टी का है घर अपना और तिस पर
बारिश के भी हैं इमकान, रहने दो

है जमीन पर कब्जा तो तुम ही रखो,
हमरे हिस्से का असमान, रहने दो

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, ऐ भाई
निरे उल्लू हैं, पर, इंसान रहने दो!

जान के लाले पड़े इश्क के चक्कर में
मत पड़ो ऐ लाले दी जान, रहने दो

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कानों देखी, आँखों सुनी

आदमी चाह ले तो काम बड़ा कोई नहीं,
जर्फ़ जिंदा हो तो फिर जाम बड़ा कोई नहीं,
बस के इंसान को इंसान होना मुश्किल है,
बढ़ के इस से यहाँ इनाम बड़ा कोई नहीं!

हमको माजी के दरीचे में खड़ा रहने दो,
और फर्दा पर जो पर्दा है पड़ा रहने दो,
तुम्हारे तीर मेरे बदन पे बहुत फबते हैं,
ये जवाहर मेरे सीने पे जड़ा रहने दो!

हाथ है, मसलते हैं, सर है तो धुनते हैं,
गुण अवगुण सभी मन में ही गुनते हैं,
जो कभी लिहाफ-ए-एहसास में गांठें आएं,
अपनी माजी की रुई आप ही हम धुनते हैं!

ख्वाब तो ख्वाब हकीकत भी हम बुनते हैं,
फूल हो जाते हैं कांटे भी अगर चुनते हैं,
देख लेते हैं सब कानों से ही नाबीना,
और जो बहरे हैं आँखों से सब सुनते हैं!

 

Tarar Tharoor Mile

बेतरार तो तरार मिले, तरूर मिले,
—- एक तोतली ग़ज़ल

किस मौत का नाम, ट्विटर है, और हम हैं दोस्तो,
सोशल मीडिया का, कहर है और हम हैं दोस्तो!

जो बीबीएम में था, बीवी ने वो, टीवी में ला दिया,
अब सेंसेशनल सी इक लहर है, और हम हैं दोस्तो!

कभी नेहरुवियन, नॉलेज के, नम्बरदार होते थे,
अभी नामुरादी का नहर है और हम हैं दोस्तो!

हमको पावर में, हर आवर, नया शगल चाहिए,
बाबा कहते हैं, ये ज़हर है, और हम हैं दोस्तो!

हमको जीसस ने कहा, पड़ोसी से, प्यार करो,
ये सब खुदा की ही मेहर है, और हम हैं दोस्तो!

हर लिमिट तक, हर बटन को, है पुश किया हमने,
हमारे साथ में अभी पुष्कर है और हम हैं दोस्तो!

सत्तावन में भी सत्ता है, और हम वन हैं, नम्बर में,
खेलने-खाने की भी उमर है और हम हैं दोस्तो!

इत नजर देथ लो हमतो तो तरार आ जाए,
त तो त तहता मेरा लवर है और हम हैं दोस्तो!

ग़ज़ल बहाना है, ये शेर, हमारे हैं मगर
मुनीर नियाजी की बहर है और हम हैं दोस्तो!

(ये फसल मुनीर नियाजी की बनाई ज़मीन पर उगाई है. उनकी मशहूर ग़ज़ल ‘उस बे-वफ़ा का शहर है और हम हैं दोस्तो!’)

The Last Press Conference

इति! हास! कृति गरीब खुसरो  

आओ सखियो मंगल गाओ, रूठे पिया ने बोली बतियां,
मनमोहन के सदके जाऊं, जाए लगाऊं उनको छतियां!

ग्वाल बाल सब खाय गए हैं, आवंटन के सारे माखन,
मैया मोरी मैं नहीं खायो, कोसो काहे हो दिन रतियां!

लोकपाल हैं खड़े दुआरे, मन रे गा सब गीत सुहाने,
कोएलिशन के धर्म में हुई, जो भी हुईं हैं हमसे खतियां!

मोदीजी हैं रक्त से रंजित, हमरी सिर्फ छवि है भंजित
उनको आसन पर जो लाओ, मारी गई क्या तुम्हरी मतियां!

हमरे बाबा हुलारे मारे, बाबा को तुम आन बिठाओ,
आप हीं आप समर्थन आवें, पतियां के बदले में पतियां!

इतिहासों में होए तो होए हमरे कार्यकाल पर टीका,
जनता का काय भरोसा, आज छतियां, कल दुलतियां!

 

Confidence Motion

इसमें ड्रामा है, एक्शन है और टोटल इमोशन है,
आज उनके सदन में हमारा कांफिडेंस मोशन है!

ये मोशन लूज़ था अब तक, रहे महफूज़ ये कब तक?
ये सिस्टम है जो शासन का यहां परदे में शोषण है!

विश्वास हो या मत हो, जो हो गर जनता का मत है तो,
है किस बात की प्रॉब्लम, और किस बात की टेंशन है!

ज़िन्दगी चार दिन की है, तो पहले दो ही दिन में दोस्त
दो वादे कर दिए पूरे, अब आगे जो भी अड़चन है!

खाज पावर की ऐसी है खुजाने से नहीं जाती,
इस खुजली के लिए जालिम कोई पाउडर न लोशन है!

मेरे महबूब तेरी महफ़िल में मेरी समझ नहीं आता,
ये अन्दर से खिटपिट है या बाहर से अनबन है!

अगर मैंडेट देना था तो कुछ तगड़ा सा दे देते,
है जन्म से लंगड़ा, और उस पर भी कुपोषण है!

इसके काटे का कहते हैं कि पानी तक नहीं मांगे,
उन्हीं का, या खुदा, हमको भी बाहर से समर्थन है!

सपोर्ट दुश्मन का है, उस पर ये डॉक्टर हर्षवर्धन है,
मरीज़ हैं आप तो फिर आपका मालिक ही भगवन है!

साल मुबारक

साल बदला है तो आपको हो साल मुबारक,
हाल बदला नहीं फिर भी बहरहाल मुबारक!
बीता जो साल आपको सालेगा सालों तक,
आया जो साल उसकी नई चाल मुबारक!

आम आदमी को दिल्ली की कुर्सी है मिल गई,
राजनीति में आया जो वो भूचाल मुबारक!

सत्ता के गलियारों में ईमान है उग आया,
स्थाई तो नहीं है पर फिलहाल, मुबारक!

नेता जी की चमड़ी तो दमड़ी से अलग है,
जनताजी को ये मोटी होती खाल मुबारक!

तुम्हें अन्ना के दुधमुंहें सपनों की कसम है,
तगड़ा ना है, लंगड़ा है पर लोकपाल मुबारक!

एक बाबा के सपने ने हमरी नींद उड़ा दी,
खुदाई में जो मिला नहीं वो माल मुबारक!

शिकारी आएगा जाल बिछाएगा दाना डालेगा,
रट रट के जो फंसते हैं उन्हें जाल मुबारक!

रहने को तो हम साथ ही रहते थे, रहेंगे,
दरकार है हर पंछी को इक डाल मुबारक!

ठण्ड है प्रचंड और पीड़ित को मिले दंड,
इस कदर घमंड, भई, कमाल! मुबारक!

दिल तो मुज़फ्फरनगर का रिलीफ कैम्प है,
सुबह टूटेगा पर अभी शब-ए-विसाल मुबारक!

जो सैफई में सेफ है उस वोटबैंक की कसम,
बिलखते बच्चों कों आइटम-ए-पामाल मुबारक!

सावन के अंधों को हरित क्रान्ति से क्या,
ये पीला है, नीला है या है लाल, मुबारक!

जो दिखलाते रहते हैं हर इक को आइना,
उन आइनादारों को तेजपाल मुबारक!

अलाई खा गए मलाई और हम देखते रहे,
कांग्रेस को रह गया है बस मलाल मुबारक!

हेमा के गाल वाली सड़कों को दी उपमा,
बहुत बजाते हैं जो लोग उन्हें गाल मुबारक!

लायक नहीं हैं इसके पर अमला है, बंगला है,
गधों को मिल गया है जो घुड़साल मुबारक!

क्रिकेट का बुखार तो उतरेगा ना कभी,
इस साल वर्ल्ड कप है तो फ़ुटबाल मुबारक!

समानता उपलब्धता पर इस हद तक है निर्भर,
है घर की मुर्गियों को भी अब दाल मुबारक!

रूपए और डॉलर में क्यों बनती नहीं कभी,
हमको भी हो करेंसी में इक उछाल मुबारक!

वादों की लड़ी बन रही है पार्टी दफ्तर में,
गंजों को मिल सकते हैं कुछ बाल मुबारक!

चौदह में फैसला है इस पार कि उस पार,
तब तक आप सब को केजरीवाल मुबारक!

To Syria, With Indifference

Syria

(Syria is the English name for the country called Shaam. सीरिया का असली अरबी नाम शाम है.)

Syria

धीरे धीरे गहराता है रंग लहू का शाम पर,
शक़ तक ना हो ताकि तुमको इस ख़ूनी अंजाम पर!

तैयारे हैं तैयारी में अब बारी है बमबारी की
लाखों जाने जाएंगी एक कातिल के नाम पर!

मगरिब को मौक़ा है, अबकी इसको भी सदचाक करो,
कौन असद के सदके जाए ऐसे नाज़ुक मकाम पर!

हम गर भूल गए कर वादा इतना क्यूं गुर्राते हो
तुम भी कौन ठसे बैठे थे भरी दुपहरी बाम पर!

तर्क किया है उसको कोसो इतना तो तुम फर्क करो
कासिद पर क्यूँ चढ़ बैठे हो नापसंद पैगाम पर!

अपने सुख से कौन सुखी है दुनिया के मयखाने में
अपनी सुराही बगल दबाई, आँख और के जाम पर!

Ram Ram

Asaram Bapu / image courtesy Indian Express

Asaram Bapu / image courtesy Indian Express

आ के अब आराम नहीं है,
बिपदा घनी है बिराम नहीं है।

जिस पर हमनें सुबहें वारीं,
नहीं नहीं ये वो शाम नहीं है।

सावन में अंखियां ही बरसी,
उफ़ुक पे भी घनशाम नहीं है।

कलजुग में कल कैसे पावैं,
आज का जब अंजाम नहीं है।

मय मय है मयखाना लेकिन,
तश्नालब को जाम नहीं है।

गुलशन में मातम का आलम,
गुल है मगर गुलफाम नहीं है।

आसा टूटी भरोसा टूटा,
काम पे कोई लगाम नहीं है।

संतन रूप में रावण घूमैं,
आ राम, आराम नहीं है।

Johar Jharkhand

हमार झारखण्ड है, तोहार झारखण्ड है,
और जो बच गए जोहार झारखण्ड है!

कहते हैं कि बाबा बिराजते हैं झारखंड में.
अब तो वो बिराजते हैं कि बाबा रे बाबा.
बाबू बिराजे जब बिहार से अलग हुए,
अर्जुन लास्ट में सत्ता से थलग हुए.
झारखंड में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर
बिराजने वालों की लाइन
है बड़ी ही फाइन.

चार लोग आठ बार कुर्सी पर बैठे हैं,
दो बार कुर्सी ही राजभवन हो आई है.
लेटेस्ट ये है कि हेमंत के नीचे होगी,
कांग्रेस के दूध में धुल के ताज़ा सेक्यूलर
हुए हैं, तो राजद भी पीछे होगी!

पिताजी घंटाल थे, गुरूजी कहलाते थे.
पर फ़ेल हो जाते थे जब गुर आजमाते थे.
अब कांग्रेस का हाथ थाम कर कुर्सी बेटे ने हथियाई है.
झारखंड की बने ना बने, राजनीति की  बन आई है.
बिहार के बंटवारे के दिन से बंदरबांट ज़ारी है.
लोहा खाने वालों को जंग लग गया है,
करप्शन का कोयला तब से लोहे पर भारी है.

जब बिहार का हिस्सा थे
तो गुरूजी सबसे बड़ा किस्सा थे.
झारखंड को बिहार से मुक्ति दिलाने के लिए मोर्चा खोल रखा था.
संसद में समर्थन की दूकान खोली तो
राव ने १ करोड़ पर एमपी का मोल रखा था.

इतनी जगहंसाई हुई कि राज्य मिला तो राज नहीं.
हाथ माला और सोच लिया कल मिलेगा जो आज नहीं  

भाजपा ने जदयू और समता पार्टी को साथ लिया
और बाबूलाल मरांडी बने पहले मुखिया,
राज्य सबसे धनी और लोग सबसे दुखिया.
नए राज्य में नया माल गपोसने में किसका हिस्सा कितना हो,
इस पर गठबंधन ही टूट गया.
उस दिन ही वो नया सपना दूर कहीं छूट गया.
खंडित जनादेश था,
मिलकर चलो ये आदेश था.
मिलकर लूटना सुन लिया सियासत ने.
बार बार टूटना सीखा रियासत ने.
टूटना ही तो खंड-खंड होना है,
अपनों से धोखे खाना झारखण्ड होना है.

मुंडा ने रूठों को मनाया,
दो साल चलाया.
चुनाव के बाद शिबू सोरेन ने अल्पमत सरकार बनाई,
दस दिन नहीं चल पाई.
फिर मुंडा ने निर्दलीयों से समर्थन जुटाया,
एक साल में ही एक निर्दलीय को गज़ब का आईडिया आया.
हमारे बैसाखी पर जब सरकार खड़ी है,
तो हम बड़े हैं या सरकार बड़ी है?
मधु कोड़ा निर्दलीयों के साथ निकल पड़े.
मुंडा के पाँव तले ज़मीन खिसक गई.
गणतंत्र की पीठ पर इतिहास में ऐसा कोड़ा नहीं पड़ा था.
एक अकेला, निर्दलीय विधायक कुर्सी पर जा चढ़ा था.
मधु तो थोड़ा-थोड़ा कर के छत्ता ही चाट गए.
बाकी जो आए वो भी आपस में बांट गए.

कब से चल रहा ये राजनीतिक दंगल है
ज़मीन के पथरीले बदन पर जंगल है,
पेट के भीतर लोहा है, सोना भी.
पाप हुआ पेट से होना भी
पेट चीर कर खदान बने हैं,
जिनसे सेठों के कलकत्ते में मकान बने हैं.
कोयला देश भर में जाता है,
तो देश भर में बिजली आती है.
यहाँ अभी देर है,
अभी तो अंधेर है.

नक्सल-प्रभावित राज्य है
तो सुरक्षा का भी पैसा है,
विकास नहीं कर पाने का बहाना है,
विकास का भी पैसा है,
ना हो पाने वाले विकास का भी कुछ ऐसा है,
कोयला है, कोलियरी है, कारखाना है भारी,
सैयां करते जी कोल बाजारी.
अयस्क में नंबर वन होते हुए भी
वयस्क नहीं हो पाया.
बच्चे को जिसने चाहा लॉलीपॉप थमाया.
साथ ही पैदा हुआ छत्तीसगढ़
दिन दूनी रात छत्तीस गुनी तरक्की कर रहा है.
पड़ोस में पड़ोसी जीते जीते मर रहा है
झारखंड एक प्रश्न है जिसका उत्तर नहीं,
दक्षिण भी नहीं, जो है वो थोड़ा वामपंथ है.
उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आई तो देश सिहर गया,
यहाँ प्रकृति पर आपदा है, आपदा की प्रवृति है.

विधानसभा त्रिशंकु रहने की आदी हो गई है.
ऐसे में जोड़-तोड़,
मोल-भाव
चलता रहता है.
सरकारें आती हैं,
जाती हैं.
राष्ट्रपति के शासन के दोनों तरफ.
भ्रष्टाचार की ऐसी मिसाल बनाते हैं
कि दिल्ली शरमा जाती है
रांची की आंच में.
दिल्ली इस खसोट में शामिल है,
उसका हिस्सा हर नोट में शामिल है.
जलप्रपातों में ज़हर किसने घोला है,
इस सवाल के जवाब में सच कौन बोला है.
आदिवासी-दिकु का विभाजन है,
विभाजन के बाद.
आदिवासियों में हो, उरांव, मुंडा आदि का भी तो बंटवारा है.
भय और भूख. अनंत है, अनादि है.
नुक्कड़ पे रंगबाज है, जंगल में माओवादी है.
बहते हुए खून से हर वासी आदी है.
यहां का हर आदमी आदी वासी है.

झारखंड के जंगल में मंगल हो रहा है.
बुध्धू हंडिया का सोम चढ़ा के
गुरु को शुक्र है शुक्र है कह रहा है
क्योंकि सनीचर को इतवार का इंतजाम करना है.
बुद्धू बेचारे को सातों दिन काम करना है
क्रशर पर जाकर गिट्टी फोड़ना है
काम क्या दिन भर पत्थर तोड़ना है
क्योंकि बाकी वो जो सिलसिला है
तेरह सौ सालों से नहीं टूटा है,
तेरह साल में कहां से टूटेगा?

खीर की आस

मुफ्त का चन्दन, घिसो रघुनन्दन.
हम तो अपनी धुन में गुनगुना रहे थे,
सुनते ही रघुनंदन कुनमुना गए
और हमें ही सुना गए
“भैया मुफ्त की तो मौत नहीं मिलती,
चन्दन कहाँ से मिले?
चूहे मारने का ज़हर भी जेब से बाहर है.”

हमने समझाया भैया ज़हर क्यूँ खाओगे,
जल्दी ही यूपीए की सरकार भोजन की गारंटी दे रही है.
खाद्य सुरक्षा बिल पास हो गया.
प्रणब बाबू का अध्यादेश आ गया है. अब एक रूपए किलो चावल मिलेगा.

“चुनाव आने वाला है क्या?”
राघुनंदन झट से बोले.
हमने कहाँ एक आहट सी तो आई है.
इतने में रघुनन्दन का पारा आसमान पर.
“जब बाकी चीज़ों के दाम आसमान पर होंगे
हमारे पारे की तरह
तो एक रूपए किलो चावल के क्या पकेंगे
खयाली पुलाव के सिवा?”

इतने में बीजेपी के लालजी पधारे
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के चावल के चक्कर में चूक मत जाना,
कमल पर मुहर लगाना
क्योंकि हमारी प्लानिंग है
सबको खीर खिलाने की.

खीर की बात पर
मुंह में आए पानी को
अन्दर ही डिपोजिट कर के
रघुनन्दन जी ने फुल एटेंशन
लालजी की तरफ किया और फरमाया,
“वो कैसे?”

“अरे भाई इस खाद्य सुरक्षा बिल से सांप निकलेगा
और डंस लेगा. इस काटे का इलाज तो मोदी जी भी नहीं कर पाएंगे.”

“सही कहते हो,
नीतीश के काटे का इलाज़ तो कर नहीं पाए,
सांप के काटे का पता नहीं
पानी मांगे ना मांगे.”

“यार बात का फ्लो मत बिगाड़ो.
सुशील-नीतीश तो आस्तीन के सांप निकले.
आस्ते-आस्ते काटा.
पर हम बात तो डेवलपमेंट वाले मोदी जी की कर रहे थे.
उन्होंने गुजरात में अमूल दूध की नदियाँ बहा दी हैं.
नदियों को जोड़ने का तो
भाजपा का प्लान पुराना है.
अब अगर हमारी घाघरा
साबरमती से जुड़ गई
तो घाघरे में दूध होगा.
चोली में चावल.
चीनी तो चीन से सस्ती वाली मंगवा लेंगे.
ग्लोबल वार्मिंग की आंच पर खीर पका लेंगे.”

“झोली में चावल तो सुना था,
तुम चोली में चावल कहाँ से चुरा लाए?”

“चोली-दामन का साथ है,
मोदी का विकास से.
विकास का मोदी से.
जहाँ मोदी हैं, वहां विकास है.
जहाँ विकास है, वहां मोदी हैं.”

हम इस किचाहिन में कूद पड़े.
“वैसे ही जैसे कीचड़ में कमल खिलता है.
जहाँ कीचड़ है वहां कमल है.
जहाँ कमल है, वहां कीचड़ है.”

“कर दी न लीचड़ वाली बात.
भैया, हम कीचड़ में कमल उगाते हैं.
नरेन्द्रभाई भी उगे हैं.
जहाँ-जहाँ देश में पिछड़ेपन का कीचड़ है
वहां-वहां हम नया कमल एक खिलाएंगे.
जो देख नहीं पाते वो कमल ककड़ी खाएंगे.
जैसे गुजरात को चमकाया है, देश को चमकाएंगे.
मौका दोगे तो दिखलायेंगे,”

लालजी चमका रहे थे
या धमका रहे थे,
इसका अंदाजा हम लगा रहे थे
तभी रघुनन्दन फूट पड़े.

“एक मौका दिया था.
चौका लगाया नहीं,
फेर दिया आपने.
भारत को ऐसा चमकाया
कि हमारी आँखें चौंधिया गईं.
कमल का बटन दिखाई नहीं पड़ा.
हाथ की ऊंगली हाथ पर गई.
नौ साल से उसी ऊंगली से उलझ रहे हैं
कि देश के मसले क्यों नहीं सुलझ रहे हैं.”

चुनाव का मौसम है.
उम्मीदवार उम्मीद से होंगे,
हम सब को भी दीद से होंगे.
गाना होगा भाषण होगा,
पोस्टर का प्रकाशन होगा.
हमसे ना रहा गया,
सो हम गमछा झाड़ते-झाड़ते
ये भाषण झाड़ गए.

वोट ना हुआ मुसीबत हो गई.
देना फ़र्ज़ है, सो देते हैं.
फिर आगे उनकी मर्ज़ी जो लेते हैं.
भारी मतों से विजयी बनाओ,
फिर वह आपको पांच साल बनाएंगे.
बनाया रिपब्लिक है,
बनाना रिपब्लिक है,
पब्लिक ही बनती है.
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