Ram Ram

Asaram Bapu / image courtesy Indian Express

Asaram Bapu / image courtesy Indian Express

आ के अब आराम नहीं है,
बिपदा घनी है बिराम नहीं है।

जिस पर हमनें सुबहें वारीं,
नहीं नहीं ये वो शाम नहीं है।

सावन में अंखियां ही बरसी,
उफ़ुक पे भी घनशाम नहीं है।

कलजुग में कल कैसे पावैं,
आज का जब अंजाम नहीं है।

मय मय है मयखाना लेकिन,
तश्नालब को जाम नहीं है।

गुलशन में मातम का आलम,
गुल है मगर गुलफाम नहीं है।

आसा टूटी भरोसा टूटा,
काम पे कोई लगाम नहीं है।

संतन रूप में रावण घूमैं,
आ राम, आराम नहीं है।

Advertisements

Siddharth!

 Bodhi Tree

जिस बरगद के नीचे तुमने
देखी थी अनहद रूहानी रौशनी,
उसके नीचे तीरगी है,
इस क़दर कि कुछ दिखता नहीं

तुम्हारे ज्ञान का प्रकाश
दुनिया भर में
इक अंधेरा सा हमारे
ज़ेहन में, घर में

दिए तले की उसी स्याही में
हमने इस इतवार फिर पोता है
शांति की इमारत को,
भिक्षुओं के खून से
अहिंसा की इबारत को

बरगद के नीचे
कभी कुछ उगता नहीं
बारूद बो दिया
तो नया बोध उगा है
तुम्हारा बोध गया
हमारा अपराधबोध गया

Tunna Tunna

uttara

पानी भीतर प्यासी दुखिया
भुख्या से तो अंतड़ी सुख्या
उड़नखटोले बैठे मुखिया
गुण शुन्ना और नाम बहुगुणा
तुन्ना तुन्ना तक तक तुन्ना!

रुद्रनाथ का रूप प्रचंड है
मानुष को फिर भी घमंड है
प्रश्न अखंड औ उत्तर खंड है
धरती को लग गया रे घुन्ना
तुन्ना तुन्ना तक तक तुन्ना!

राजनीति की हांड में तप के
फेंकू फेंके तो पप्पू लपके
रिस के रिलीफ अगर जो टपके
मिले मलाई चाट ले मुन्ना
तुन्ना तुन्ना तक तक तुन्ना!

जिनको ये लागी लगत हैं
जग सोवत औ हमीं जगत हैं
जड़ भगत, चेतन भगत हैं
जनता को तो लगत हैं चुन्ना
तुन्ना तुन्ना तक तक तुन्ना!

Marham

जब कोई भी नया ग़म मिला है, جب کوئی بھی نیا غم ملا ہے
मेरे ज़ख्मों को मरहम मिला है. میرے زخموں کو مرہم ملا ہے

यूं मिला तो बहुत कुछ बहुत है, یوں ملا تو بہت کچھ بہت ہے
जो कम था वही कम मिला है جو کم تھا وہی کم ملا ہے

तेरी लागर्ज़ी मर्ज़ी है तेरी تیری لاگرزی مرضی ہے تیری
मर्ज़ हमको भी बाहम मिला है  مرض ہمکو بھی باہم ملا ہے

बज़्म-ए-ग़ैरां है हैरां किस शै पर, بزم غیراں ہے حیراں کس شی پر
जब मिला हमको बरहम मिला है جب ملا ہمکو برہم ملا ہے

तेरी आँखों के पीछे जुबां है تیری آنکھوں کے پیچھے جباں ہے
बोलती हैं कोई पुरनम मिला है بولتی ہیں کوئی پرنم ملا ہے

शरबत-ए-हिन्द पूछो ना लज्ज़त  شربت ہند پوچھو نہ لذّت
गंगाजल में आब-ए-ज़मज़म मिला है گنگاجل میں اب زمزم ملا ہے

Lamb’s Tale

बहुत हुआ कि अब नहीं मेरे सरकार नहीं
यक़ीन तुमपे है तेरे वादों पे ऐतबार नहीं

और कितने बरस होगा इंतज़ार-ए-बहार
इंतहा हो चुकी अब सब्र-ए-इंतज़ार नहीं

हमें तो उज्र है बस हाँ में हाँ मिलाने से
तुम्हारी बात से हमको कोई इनकार नहीं

कभी कभार जो हो जाए खता होती है
मुआफ़ कर दूं गर सताओ बार बार नहीं

सर को छत बदन को वर्क पेट को रोटी
हक़ ये नारों के हक़ीक़त में नमूदार नहीं

मसखरी करता है महफिल में इंतख़ाब तेरा
तुम शर्मिंदा हो पर ज़रा भी शर्मसार नहीं

चमन क्या करे इक गुल के गुलमटे इतने
ग़ुलाम ख़ुशरू के ख़ुशबू के पैरोकार नहीं

दिया हमीं ने हुकूमत का अख़्तियार तुम्हें,
हमारा तुमपे कभी कोई अख़्तियार नहीं?

ये आम राय है ज़ालिम हो मुन्तख़ब रहबर
यही है राह तो फिर हमको करो शुमार नहीं

ज़ुल्म ऐसा कि ख़ुद की सोच जुर्म जैसा है
इल्म इतना नहीं ये इश्क़ है व्यापार नहीं

कितनी तारीक़ हैं ये जुल्मतें जहालत की
कि तालिब भी रोशनी के तलबगार नहीं

तुम्हारी याद के धागों से ख़्वाब बुनता हूं
तेरी क़सम मेरा और कोई रोज़गार नहीं

साकिया हो चुका रिंदों का इम्तिहान बहुत
तेरा ख़ुमार है मय का कोई ख़ुमार नहीं

Eternal

bargad

तुम्हारे हिज्र में वैसे तो ग़म-ए-बेहद हूँ
तुम जो आए हो तो आज बहुत गदगद हूँ

सराय है दुनिया जहां से आदमी का
रफ्त जो हुआ मैं हूँ, मैं ही आमद हूँ

गर्दिशें थकें तो करती हैं आराम यहाँ
सुकून के लिए अय्याम का मैं मसनद हूँ

मैं दिलदार हूँ तो अहल-ए-दिल के वास्ते
बेदिली हो तो फिर फ़ितना-ए-आदमकद हूँ

एक डोर हूँ जिसका सिरा कोई भी नहीं
एटर्नल हूँ, सनातन हूँ, मैं तो अनहद हूँ

आवाज़-ए-हक़ को आहनी हुदूद से क्या
बाड़ के बस में नहीं हूं मैं तो बरगद हूँ।

A cat. And dogs. And gods.

1.

तुम्हें आना ही था, तुम आते ही
पर तुम आए तो बिन बताए आए
पूरी कोशिश की कि तुमसे पहले
तुम्हारी आहट ना पहुंचे हम तक
तुम्हारे तलवों में मखमल के गद्दे
दबा के रखते हैं आवाज़-ए-पा सब।
अलसाई भोर बालकनी में खड़ी
ओढ़े कोहरे की एक पतली चादर
तुमने कुछ कहा, शायद गुड मॉर्निंग
गुड मॉर्निंग टु यू टू
मेरे भी शब्द तुषार से निकले
तुम्हारे लफ़्ज़ों के गुबार से गले मिलने
हम कुहासे की भाषा में बात करने लगे!

2.

अब बताओ कहाँ बिताए दिन
और क्या रंगीन वहाँ रातें थीं
जहाँ घूमे ये नौ महीने तुम
जब हम ने प्यार में धोखा खाया
फरवरी की नर्माहट एक छलावा
कुछ दिनों में ही मई जून बना,
पालथी मार बैठ गया छाती पर
आसमां वाला भी पसीज गया
हम भी खूब रोए उन घटाओं के साथ
दिन-रात तपते रहे आग में जुदाई की
दिन-रात हमने तुम्हें याद किया

3.

आओ तजदीद-ए-मुहब्बत कर लें
गुनगुनाएं एक गुनगुनी रजाई में
गीत नजीर के, तिल के लड्डू खाएं
साज सब दांत, तबले पर संगत देंगे
सुन्न हाथों को मिलेंगे नए दस्ताने
नाक बहेगी तो गर्म चाय की सुड़की लेंगे
आँख बहेगी तो फिर सर्द होंगे अफ़साने

3.1

कि जो खुद को ही ओढ़ते बिछाते हैं
आसमां की छत, फुटपाथ का गद्दा
थकी थकान का तकिया लगा सो जाते हैं
उनकी दिसंबर में सदियों के कांटे हैं बहुत
एक गोला ऊन नहीं है कि कोई ख़्वाब बुनें
जनवरी, तुम कांटे सा चुभते हो उन आँखों में
और मुझको ये बात बहुत चुभती है

3.2

ये भी कि वो नहीं मांगते हैं
ठिठुरे होठों पर जम चुके सवालों के जवाब,
उनको मालूम नहीं, तुम्हें प्यार करें या न करें
इतना मालूम कि जन्मों का हिसाब है जो
कई जन्मों तक वसूला जाएगा,
कि जो खा रहे हैं ढाबे का ठंडा जूठन
ये उनके कर्मों का फल है या इंतज़ार का फल
मीठा लगता है भूखे को सबकुछ,
कुछ भी कड़वा नहीं लगता सच में
फिर वही रात, नई जंग कुदरत के खिलाफ
सड़क के बीचोबीच एक नो मैन्स लैंड में
घुटने ठोड़ी तक ला आदमी गोल हुआ
ट्रैफिक लाईट के ठूंठ की ओट में
ये जंग देख तुम्हारी भी रूह कांपी थी
तुम थे फ़रकोट में, मैं भी फ़रकोट में

Morning After

दीपावली की रात की सुबह नहीं होती
दिन होता है
जब रात की चुंधियाई आँखें
उबासियाँ लेकर खुलती हैं
और घर के सामने सड़क पर
युद्धक्षेत्र का आभास होता है
रात के अनार औंधे पड़े देखते हैं
लड़ियों ने जल कर कैसे फूल की
पखुडियाँ बिखेरी हैं
सड़क के आवारा कुत्ते
जो ना जाने कहाँ गायब रहे सारी रात
दबे पाँव सूंघते हैं घटनास्थल को
ज़्यादातर घरों में रौशनी की कतारें
आखिरी घड़ी की तरह जलती-बुझती
रात का धुंआ छत से ठीक ऊपर
चादर बन सूरज से कहता कि
थोड़ी देर बाद आना, घर में सब सो रहे हैं
गेंदे की गंध में घी मिलाया है रात ने
और चासनी सी तैर रही है,
ड्राइंग रूम में रखे कृत्रिम फूलों को मुंह चिढाती
इन गेंदों को बहते पानी में जाना है
जल्द ही
सारे सबूत आज मिटाए जाएंगे
अपने बालों से बारूद की बू
पटाखे के दुकान की रसीद
सेंटर टेबल के नीचे की खाली बोतलें
और किचन के सिंक में बर्तनों का पहाड़
रहेगी तो बस दरवाज़े पर रंगोली
जब तक रहे,
शुभ दीपावली का चाइनीज़ झालर
जब तक टिके!

Lord vs Ram: Objection, Milord!

(राम राघव रक्षमाम जपने वाले राम को बचाने को उतावले हैं. राम जेठमलानी के जीभ काटने वाले को ११ लाख इनाम की घोषणा हो चुकी है. धर्मो रक्षति रक्षितः की दलील दी जारी है. बिना यह समझे कि राम की रक्षा के लिए उठे हाथ यह बताते हैं कि राम स्वयं की रक्षा करने के लिए सक्षम नहीं. त्रेता नहीं है, कलियुग ही है.)

अयोध्या इंतज़ार में थी
नैनों के दीप जलाए
लंका पर विजयी होकर
लॉर्ड राम जब घर आए

मर्यादा पुरुषोत्तम हैं
देवों में उत्तम हैं
जग में जाते पूजे हैं
पर एक राम दूजे हैं

‘ऑब्जेक्शन मिलॉर्ड’
वकील राम बोल पड़े
अयोध्यापति श्रेष्ठ होंगे
पति आप आम थे

गर्भवती पत्नी की,
यूँ किसी के कहने पर
अग्निपरीक्षा ले ली,
कैसे आप राम थे?

अब जवाब कौन दे,
राम तो रहे नहीं
राम के वकील सब
उठ खड़े हुए वहीं

कण-कण में बसते हैं
उनपर आप हँसते हैं
राम के अस्तित्व पर
फब्तियां कसते हैं

राम के नाम पर
जान भी दे सकते हैं
दूसरे किसी राम की
जान ले भी सकते हैं

राम की शरण में ही
जो सुरक्षा पाते हैं
डर जब सताता है
राम नाम गाते हैं

वो ही सबक राम का
राम को सिखाएंगे
जो सबको बचाता है
उनको ये बचाएंगे

राम की कथाओं में
राम राज करते हैं
हृदय वाले राम का
वनवास अभी बाकी है

मंदिरों में मूर्ति है,
अयोध्या के स्वामी की
मन में जो रावण है
उसका नाश बाकी है

मुंह में ही राम है,
इसलिए ये क्रोध है
दिल में राम होने का
एक अलग ही बोध है

एक बार लंकापति
रो रहे थे आँगन में
मंदोदरी ने पूछ लिया
क्या छुपाया है मन में

लंकापति बोले प्रिये
किसी को बताना नहीं
क्या मैं कुरूप हूँ?
सच को तुम छुपाना नहीं

पत्नी बोले ज्ञान में,
रूप में या रंग में
तुम किसी से कम नहीं
रहो किसी ढंग में

फिर क्यूँ वो सीता मुझे
देखती बतियाती नहीं?
ऐसी कौन सी विद्या
है जो मुझे आती नहीं

कहा ये मंदोदरी ने
तुम कुछ भी कर सकते हो
चाहो तो राम का
रूप भी धर सकते हो

बोल उठे लंकापति,
भोली हो तुम भी प्रिये
ये उपाय ना करते
सब उपाय हमने किए

रूप धरा उसका पर,
आया नहीं काम में
ऐसी कुछ बात है
राजा श्री राम में

राम मैं बना जैसे
आँख मेरी भर आई,
हर पराई स्त्री में
अपनी माँ नज़र आई

शायद इस मर्म का
ही मर्यादा नाम है,
पुरुष उत्तम हो जाए
मन में अगर राम है

राम है जुबान पर तो
काटो जुबान राम की
और हृदय में हो तो,
दुनिया है राम की

राम थे भी या नहीं
इस जटिल प्रश्न का
उत्तर इक नाम है
जो भी है, राम है

या तो राम सबके हैं,
या हैं एक पंथ के
या तो राम राजा थे
पात्र किसी ग्रन्थ के

पात्र की परिभाषा है,
रिक्त पात्र होता है,
जो है भरा पहले से,
वह अपात्र होता है

रिक्त पात्र को कोई
गंगाजल से भरता है,
और कोई चाहे तो,
उसमें विष धरता है

पूछो कि तुम्हारे लिए
क्या राम एक पात्र हैं?
हैं दया के सागर या
राम नाम मात्र हैं?

राम के आरोपों का
राम ही उत्तर देंगे,
रामभक्तो रहने दो,
राम रक्षा कर लेंगे!

Worshipping you to death

1.

ये जो भावनाएं आहत हैं, अकारण नहीं हैं
मंदिर और टॉयलेट की तुलना कर दी!
पवित्र और अपवित्र एक ही वाक्य में
तो विन्यास की आवश्यकता क्या है?
अक्षम्य अपराध है, संस्कृति पर चोट है,
हाँ इस देश में मंदिर बहुतायत में हैं,
पर हमारे हैं, जैसे ये देश हमारा है,
जहाँ हरे हरे खेत हैं, जहाँ सुबह होती है
जहाँ खेत नहीं है, वहाँ सरकार ने रेलवे लाइन बिछवाई है.

मंदिर हमारे हैं, परिसर हमारा है,
लाइन में खड़े लोगों की पीकें,
अड़े पानी की सड़ांध,
औंधे पड़े भिखारियों के कोढ़ की कराह,
पंडों के भ्रष्ट गर्दन की मैल,
भाग्य के मारों का ब्लैकमेल,
ये सब भगवान के सामने होता है, पीठ पीछे नहीं.
जब परम-पूज्य परमात्मा माइंड नहीं करते
तो किसी मंत्री-संत्री को अधिकार किसने दिया है
इस तरह का अनर्गल प्रलाप करने का

अपवित्रता नहीं होगी तो पवित्र क्या होगा,
कीचड़ में ही कमल खिलता है,
कमल पर ही भगवान विराजते हैं,
साफ़ तो घर होते हैं पूजा करने वालों के,
टाइल वाले बाथरूम में
नए हार्पिक की बस एक बूँद,
गार्डन के फूलों में ड्राइंग रूम सा अनुशासन,
हर बेडरूम में एयर फ्रेशनर,
टॉयलेट में लैवेंडर की भीनी खुशबू

भगवान का घर है, मनुष्य का नहीं,
यहाँ अपवित्र भी पवित्र है,
पर अगर यह ईश्वर का नहीं,
किसी हरेश-सुरेश-रमेश का घर होता तो?
क्या नाक पर हाथ रख मन्त्र बुदबुदाते?
क्या स्वच्छता का यही मापदंड होता?

2.
हज़ारों करोड़ रूपए बहा गई,
लाखों करोड़ पापों के साथ,
सात-सात जन्मों के पाप
एक डुबकी में साफ़ करती है जो,
उसकी सफाई के नाम पर
खज़ाना साफ़ होता है,
दुनिया की पवित्रतम नदी,
और सबसे प्रदूषित भी,
भटकती आत्माएं, फूले सड़े,
बू मारते शरीर जानवरों के, मनुष्यों के,
मल-मूत्र, पूजा के फूल
सब समा जाते हैं माँ की गोदी में,
गंगा अगर पवित्र ना होती तो
क्या इतनी मैली होती?

3.

जिस कदम्ब के ऊपर,
श्याम बंसरी बजाते थे,
और गोरी राधा दूधिया कॉन्ट्रास्ट देती थी,
उसके नीचे अब एक
गन्दा नाला बहता है,
ताज की विस्मयकारी श्वेत शिलाओं को
कॉन्ट्रास्ट मुहैया कराता है
आँखें फाड़ हम ताज को देखते हैं,
नाक पर रूमाल रखे,
यमुना को अगर हम नहीं पूजते
तो क्या वह बन पाती गन्दा नाला?

4.
अखबारों के पन्नों में नखरे दिखाती है
विदेश तक में भारत का नाम होता है
ट्राफिक आइलैंड पर बैठ पगुराती है
ट्रकों, बसों, कारों से बचती
कूड़े घर को तलाशती भटकती
दिन में किलो भर पोलीथीन चबा जाती है
निगम वाले पकड़ते छोड़ते हैं,
जिस दिन ट्राले की चपेट में आ जाती है
सड़क पर तड़पती है, निगम वाले ही उठाते हैं,
गाय अगर माता नहीं होती
तो क्या पोलीथीन खा कर आत्महत्या करती?

5.
जब हार जाता है आदमी
तो पेशानी पर उभरी लकीरें
मस्तिष्क पर गहरा घाव करती है,
अपने हाथों से छू कर सारे घाव भरती है
उस हाथ को लोग जुए में हार जाते हैं,
बेटा पैदा करनेवाली मशीन ना निकली
तो पंखे से झूल जाती है,
बाज़ार में बिकती है, पिटती है, मिटती है,
उसके जीने की जो भी सीमाएं हैं,
उसे लक्ष्मण रेखा मान खुश रहती है,
रेखा के भीतर वो घुटती है, बाहर हो लुटती है
अगर नारी पूजनीय नहीं होती,
तो क्या इतनी प्रताड़ित होती?