Irony Man

हे युग पुरुष, युग का अंत हुआ, सूरज के साथ कयाम करो,
जो जुग बीता उसे देखो मत, उगते सूरज को सलाम करो!

तुमको आपत्ति हुई नहीं, कभी लौह पुरुष कहलाने में,
गर्म रहोगे, चोट पड़ेगी, रीत यही है ज़माने में,
तुम बने बहुत कुछ, अब न बनो, बन में जाओ बिश्राम करो!

लोहा लोहे को काटता है, ये टुंडे ठाकुर कह के गए,
तुमसे पहले भी कितने कटे, टुंडे हुए औ रह के गए,
तुम लोहे के चने चबाओ, घर में रहो आराम करो!

लोहा फूलता-फलता है, जब तक चलता है, चलता है,
जंग में खून बहाता है, जंग खाता है, फिर गलता है,
गलता है सो गलत नहीं है, सही को ना बदनाम करो!

किस्मत कह लो लोहे की, इसके दो ठिकाने पुराने हैं,
कारखाने अयस्क गए औ वयस्क कबाड़खाने हैं,
दो खानों में खानाखराब तुम ना आखिरी जाम करो!

जब काम किया तब नाम किया, मौके पे जै श्री राम किया,
राम का नाम लो लाल मेरे, महफ़िल को राम राम करो!

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Wrath Yatri

न जाने क्या हुआ है ऐसा, वो हत्थे से छूट गए हैं
रथ के पहिए टूट गए हैं, बालम मोसे रूठ गए हैं!

लाली हो गई कृष्ण सी काली, रंग उड़ गए होश के साथ
हाथों में थे जितने पटाखे हाथों में ही फूट गए हैं!

मातमपुर्सी-ए-इश्क-ए-कुर्सी, लालिहाज़-ए-उम्र-दराजां,
ज़ेर-ए-नज़र जो एक कनी थी अपने ही आकर लूट गए हैं

गुड़गुड़ करते रहे गुरु और, शक्कर हो गए सारे चेले,
किस बेदर्दी से वो ज़ालिम ज़र-ए-उमर को कूट गए हैं

इक टूटे ढाँचे में बिराजे, राम लला ये देख के बोले,
है इतिहास गवाह रे बेटा,  तोड़ने वाले टूट गए हैं!

 

Marham

जब कोई भी नया ग़म मिला है, جب کوئی بھی نیا غم ملا ہے
मेरे ज़ख्मों को मरहम मिला है. میرے زخموں کو مرہم ملا ہے

यूं मिला तो बहुत कुछ बहुत है, یوں ملا تو بہت کچھ بہت ہے
जो कम था वही कम मिला है جو کم تھا وہی کم ملا ہے

तेरी लागर्ज़ी मर्ज़ी है तेरी تیری لاگرزی مرضی ہے تیری
मर्ज़ हमको भी बाहम मिला है  مرض ہمکو بھی باہم ملا ہے

बज़्म-ए-ग़ैरां है हैरां किस शै पर, بزم غیراں ہے حیراں کس شی پر
जब मिला हमको बरहम मिला है جب ملا ہمکو برہم ملا ہے

तेरी आँखों के पीछे जुबां है تیری آنکھوں کے پیچھے جباں ہے
बोलती हैं कोई पुरनम मिला है بولتی ہیں کوئی پرنم ملا ہے

शरबत-ए-हिन्द पूछो ना लज्ज़त  شربت ہند پوچھو نہ لذّت
गंगाजल में आब-ए-ज़मज़म मिला है گنگاجل میں اب زمزم ملا ہے

Vodka & Rhyme

Rush to die

Ruled by elected crooks
who book you for writing books,
This is that time,
When speech is a crime,
Get your vodka & lime
And make them rhyme!

Jugni
Jugni kardi press conference,
Kar ke Dilli poora tense,
TV-media in attendance,
Going on total offence,
Bhai mere ae ve Jugni Kejri hai
Scandal di ae treasury hai..

Ho Jugni former bureaucrat,
Anna Hazare ko kar ke set,
AAPe aam, AAPe great,
Poori duniya hui flat,
Bhai mere ae ve Jugni Kejri hai
Ae mulk di ae hi tragedy hai

Balle Balle

Jugni calls it an utter lie,
His charges she does deny,
Loki asking tell us why
Is the tariff touching sky
Phir mere ae ve #Jugni Sheila ae,
Administration bhi te dheela ae!

CAG Audit khilauna ae,
Agle saal to chona ae,
Public ne raula pauna ae,
Je hona hai te hona hai,
Phir mere ae ve #Jugni Sheila ae,
Administration bhi te dheela ae!

Red Sea
Anna proposes
Sonia disposes
#Kejriwal exposes
In really small doses
Bhushan deposes
Bedi just poses
Smelling like roses
Who the F is Moses?

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Lamb’s Tale

बहुत हुआ कि अब नहीं मेरे सरकार नहीं
यक़ीन तुमपे है तेरे वादों पे ऐतबार नहीं

और कितने बरस होगा इंतज़ार-ए-बहार
इंतहा हो चुकी अब सब्र-ए-इंतज़ार नहीं

हमें तो उज्र है बस हाँ में हाँ मिलाने से
तुम्हारी बात से हमको कोई इनकार नहीं

कभी कभार जो हो जाए खता होती है
मुआफ़ कर दूं गर सताओ बार बार नहीं

सर को छत बदन को वर्क पेट को रोटी
हक़ ये नारों के हक़ीक़त में नमूदार नहीं

मसखरी करता है महफिल में इंतख़ाब तेरा
तुम शर्मिंदा हो पर ज़रा भी शर्मसार नहीं

चमन क्या करे इक गुल के गुलमटे इतने
ग़ुलाम ख़ुशरू के ख़ुशबू के पैरोकार नहीं

दिया हमीं ने हुकूमत का अख़्तियार तुम्हें,
हमारा तुमपे कभी कोई अख़्तियार नहीं?

ये आम राय है ज़ालिम हो मुन्तख़ब रहबर
यही है राह तो फिर हमको करो शुमार नहीं

ज़ुल्म ऐसा कि ख़ुद की सोच जुर्म जैसा है
इल्म इतना नहीं ये इश्क़ है व्यापार नहीं

कितनी तारीक़ हैं ये जुल्मतें जहालत की
कि तालिब भी रोशनी के तलबगार नहीं

तुम्हारी याद के धागों से ख़्वाब बुनता हूं
तेरी क़सम मेरा और कोई रोज़गार नहीं

साकिया हो चुका रिंदों का इम्तिहान बहुत
तेरा ख़ुमार है मय का कोई ख़ुमार नहीं

ये क्या जगह है दोस्तो

तेरी महफ़िल से उठ कर के देखो़, लोग मक़तल में हैं जा बैठे
गोरे गालों से पीछा छुड़ाया काले दिल वाले चलके आ बैठे

हो दुआ अब यही कि दवा का, मरज़ पर असर हो भी जाए
उन मरीज़ों का क्या इलाज हो जो तमरीज़ा से दिल लगा बैठे

दीन-ओ-ईमान सब छीन ले जो, भूख क्या शै है तुम क्या जानो
तुमसे खाने को ही तो मांगा था तूने धोखा दिया सो खा बैठे

दिल-ओ-दिमाग़ पर हुकूमत है करता, पेट कहने को ही मातहत है
घर में चूल्हा जलाने की ख़ातिर लोग लहू क्या घर ही जला बैठे

हर जगह बेबसी का है आलम हर तरफ़ है यही शोर बरपा
क्या करने चले थे जब चले थे, आज पहुंचे यहां कर क्या बैठे

शकल में और अस्ल में और हैं, मुंह में कुछ है बगल में कुछ है
गोल खम्भों के अपने गोल घर में हम किस किस को हैं बिठा बैठे

उसकी ज़ुल्फ़ों का क़ुसूर है सब, दराज़ इतनी अगर ये बहर है
और ख़म इस कदर कि ग़ज़ल का रदीफ़ उठे तो क़ाफ़िया बैठे

A cat. And dogs. And gods.

1.

तुम्हें आना ही था, तुम आते ही
पर तुम आए तो बिन बताए आए
पूरी कोशिश की कि तुमसे पहले
तुम्हारी आहट ना पहुंचे हम तक
तुम्हारे तलवों में मखमल के गद्दे
दबा के रखते हैं आवाज़-ए-पा सब।
अलसाई भोर बालकनी में खड़ी
ओढ़े कोहरे की एक पतली चादर
तुमने कुछ कहा, शायद गुड मॉर्निंग
गुड मॉर्निंग टु यू टू
मेरे भी शब्द तुषार से निकले
तुम्हारे लफ़्ज़ों के गुबार से गले मिलने
हम कुहासे की भाषा में बात करने लगे!

2.

अब बताओ कहाँ बिताए दिन
और क्या रंगीन वहाँ रातें थीं
जहाँ घूमे ये नौ महीने तुम
जब हम ने प्यार में धोखा खाया
फरवरी की नर्माहट एक छलावा
कुछ दिनों में ही मई जून बना,
पालथी मार बैठ गया छाती पर
आसमां वाला भी पसीज गया
हम भी खूब रोए उन घटाओं के साथ
दिन-रात तपते रहे आग में जुदाई की
दिन-रात हमने तुम्हें याद किया

3.

आओ तजदीद-ए-मुहब्बत कर लें
गुनगुनाएं एक गुनगुनी रजाई में
गीत नजीर के, तिल के लड्डू खाएं
साज सब दांत, तबले पर संगत देंगे
सुन्न हाथों को मिलेंगे नए दस्ताने
नाक बहेगी तो गर्म चाय की सुड़की लेंगे
आँख बहेगी तो फिर सर्द होंगे अफ़साने

3.1

कि जो खुद को ही ओढ़ते बिछाते हैं
आसमां की छत, फुटपाथ का गद्दा
थकी थकान का तकिया लगा सो जाते हैं
उनकी दिसंबर में सदियों के कांटे हैं बहुत
एक गोला ऊन नहीं है कि कोई ख़्वाब बुनें
जनवरी, तुम कांटे सा चुभते हो उन आँखों में
और मुझको ये बात बहुत चुभती है

3.2

ये भी कि वो नहीं मांगते हैं
ठिठुरे होठों पर जम चुके सवालों के जवाब,
उनको मालूम नहीं, तुम्हें प्यार करें या न करें
इतना मालूम कि जन्मों का हिसाब है जो
कई जन्मों तक वसूला जाएगा,
कि जो खा रहे हैं ढाबे का ठंडा जूठन
ये उनके कर्मों का फल है या इंतज़ार का फल
मीठा लगता है भूखे को सबकुछ,
कुछ भी कड़वा नहीं लगता सच में
फिर वही रात, नई जंग कुदरत के खिलाफ
सड़क के बीचोबीच एक नो मैन्स लैंड में
घुटने ठोड़ी तक ला आदमी गोल हुआ
ट्रैफिक लाईट के ठूंठ की ओट में
ये जंग देख तुम्हारी भी रूह कांपी थी
तुम थे फ़रकोट में, मैं भी फ़रकोट में

Shikwa

वैसे तुम से है मुझे प्यार बहुत
मैं कुछ दिनों से हूँ बेज़ार बहुत

हुस्न ने जान की कीमत मांगी
महंगा है सच ये कारोबार बहुत

जिसको देखो तपा-तपा सा है
चढ़ा है इश्क का आज़ार बहुत

उनकी ज़ुल्फ़ों में कोई बात तो है
एक-एक ख़म में गिरफ़्तार बहुत

मेयार-ए-चश्म-ए-यार, क्या कहिए
मिकदार जो भी हो, खुमार बहुत

कमर में धार वो कि सीना चाक
दिल को सीने में भी अय्यार बहुत

रिबा-ए-दर्द का हिस्सा ना लिया
मियां तुम निकले ज़ियांकार बहुत

देख ली आपकी भी सरदारी
सर्द निकले मेरे सरकार बहुत

लहू से हाथ रंगे हैं जिस के
हर तरफ़ उसके तरफ़दार बहुत

ये सच नहीं कि ऐतबार नहीं
कर लिया हमने इंतज़ार बहुत

आँधियां ले गई सर से छत को
बारिशों के भी हैं आसार बहुत

बुलहवस बदमिज़ाज दुनिया में
आदमी हो गया लाचार बहुत

चमन समन हुआ बहार आई
आए खुशबू के खरीदार बहुत

गुलों से अपना खूं का रिश्ता है
खार क्यूँ खाएं जो हैं ख़ार बहुत

फिर वही मुश्किलें मुकाबिल हैं
अनार एक और बीमार बहुत

किस्सा-ए-दर्द मुख्तसर बेहतर
कौन सुनता हैं यहाँ यार बहुत

The Common, The Aam

किसी के साथ इनका हाथ। किसी के हाथ इनका साथ। किसी की पार्टी की हैं शान, किसी की पार्टी का हैं नाम। जिनका चिन्ह है अरविंद उनके पुराने हो गए राम, जिसको देखो वही पुकारे जय श्री आम। जय श्री आम। आम चरित मानस की रचना तो कोई नया तुलसी करे पर चरित-रहित राजनीति के मानस का राजा आम है। आज खास नहीं, पेश है एक आम पेशकश।

    आम का नाम बदनाम ना करो

खाने वाले ख़ास हैं, आम है बदनाम है।
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

घर में कोई काट रहा, लोगों में बाँट रहा,
हाथों से दबा दबा पिलपिले को छाँट रहा,
जिसके भी हाथ लगा चूस लिया छोड़ दिया,
रेशे में रस जो बचा घूस सा निचोड़ लिया,
रह गई गुठली सो उसका भी दाम है,
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

हाथों में आम है या आमों का हाथ है,
गिनती ही बतावेगी कौन किसके साथ है,
हरे-हरे आम जाने किसके साथ जाएँगे,
सफ़ेदा ये सोच रहा हम किसको भाएँगे,
केसरिया उलझन में आम नया राम है
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

सीजन शुरू हुआ तो बौराए ख़ूब थे,
आम के किसानों के हौसले मंसूब थे,
मंज़र यूँ बदला कि मंजर नहीं बचे,
फूल कर कुप्पा थे फूल भर नहीं बचे,
मौसम जो करवट ले, किस्सा तमाम है,
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

दागी हुए आमों का कौन ख़रीदार है,
फिर भी ये राजा हैं, इनकी सरकार है,
चुस गए चौसाजी युवा हृदय सम्राट हैं,
कहने को लंगड़े हैं, भागते फर्राट हैं,
तोतापुरी सोच में है, चोंच का ग़ुलाम है।
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

सियासत की फाँस में अल्फांसो फँस गया,
दिल्ली की दलदल में किशनभोग धँस गया,
दशहरी* रोती रही सदर बाज़ार में,
व्यस्त रहा संसद आम के व्यापार में
सिंदूरी जरूर है पर सुबह है या शाम है?
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

——————————————————
*आम पुल्लिंग है, आदमी की तरह। पर दशहरी यहाँ स्त्रीलिंग हो गया/गई है, बाजार के हवाले से। आम भी वैसे ही लचीला है, आप जैसा समझें।

Collateral Damage

You infiltrate into my world
Sneak in
Under the cover of darkness
Into my heart
where it snows through the year
You fire your questions
I retaliate with mine
The innocent answers
Are taken hostage
In the battlefield
Mined with betrayals
Like bullets, accusations fly
And the answers die

I wish we could meet in sunshine
On a bright day, you can see
How much I have bled,
And I can see your face
And the wounds, the bitterness
that I have only a smell of
When we engage in the fiercest fight ever
To slay the past, at last
Your place or mine,
I wish we could bring in some sunshine
Because here, it snows through the year

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तुम दबे पाँव आते हो
अंधेरे की चादर में छिपते-छिपाते
घुसपैठ करने मेरे खाना-ए-दिल में
जहां बरस भर बर्फ़बारी का मौसम रहता है
सवालों की शक्ल में गोलियाँ बरसाते
सामना करता हूँ उनका सवालों से मैं
और हमारे निर्दोष जवाब
मूक बंधक बन जाते हैं
लड़ाई के इस मैदान में
यादों, वादों के बारूदी सुरंगों के बीच
आरोपों के कारतूस सांय-सांय, दाँए बाएँ
और सब जवाब वहीं ढेर हो जाते हैं

काश कभी होते आमने-सामने
दिन के उजाले में
सूरज की नर्म धूप के साए में
तुम देख पाते मेरे सदचाक बदन पर
सभी ज़ख़्मों के निशां
मैं देख पाता तुम्हारा चेहरा
और उस के पीछे का आदमी
और उसके पीछे के सब घाव
जिनका बस एहसास भर है मुझे
कि जिनको मैं जानता-पहचानता नहीं हूँ
फिर चाहे जान देते उस आख़री लड़ाई में
इतिहास को पराजित करने की
तुम्हारे आंगन में या मेरे सहन में, कहीं भी
बशर्ते कि दिन का उजाला हो
सूरज की नर्म धूप का साया हो
क्योंकि मैं जहाँ हूँ वहाँ
बरस भर बर्फ़बारी का मौसम रहता है।