Lamb’s Tale

बहुत हुआ कि अब नहीं मेरे सरकार नहीं
यक़ीन तुमपे है तेरे वादों पे ऐतबार नहीं

और कितने बरस होगा इंतज़ार-ए-बहार
इंतहा हो चुकी अब सब्र-ए-इंतज़ार नहीं

हमें तो उज्र है बस हाँ में हाँ मिलाने से
तुम्हारी बात से हमको कोई इनकार नहीं

कभी कभार जो हो जाए खता होती है
मुआफ़ कर दूं गर सताओ बार बार नहीं

सर को छत बदन को वर्क पेट को रोटी
हक़ ये नारों के हक़ीक़त में नमूदार नहीं

मसखरी करता है महफिल में इंतख़ाब तेरा
तुम शर्मिंदा हो पर ज़रा भी शर्मसार नहीं

चमन क्या करे इक गुल के गुलमटे इतने
ग़ुलाम ख़ुशरू के ख़ुशबू के पैरोकार नहीं

दिया हमीं ने हुकूमत का अख़्तियार तुम्हें,
हमारा तुमपे कभी कोई अख़्तियार नहीं?

ये आम राय है ज़ालिम हो मुन्तख़ब रहबर
यही है राह तो फिर हमको करो शुमार नहीं

ज़ुल्म ऐसा कि ख़ुद की सोच जुर्म जैसा है
इल्म इतना नहीं ये इश्क़ है व्यापार नहीं

कितनी तारीक़ हैं ये जुल्मतें जहालत की
कि तालिब भी रोशनी के तलबगार नहीं

तुम्हारी याद के धागों से ख़्वाब बुनता हूं
तेरी क़सम मेरा और कोई रोज़गार नहीं

साकिया हो चुका रिंदों का इम्तिहान बहुत
तेरा ख़ुमार है मय का कोई ख़ुमार नहीं

ये क्या जगह है दोस्तो

तेरी महफ़िल से उठ कर के देखो़, लोग मक़तल में हैं जा बैठे
गोरे गालों से पीछा छुड़ाया काले दिल वाले चलके आ बैठे

हो दुआ अब यही कि दवा का, मरज़ पर असर हो भी जाए
उन मरीज़ों का क्या इलाज हो जो तमरीज़ा से दिल लगा बैठे

दीन-ओ-ईमान सब छीन ले जो, भूख क्या शै है तुम क्या जानो
तुमसे खाने को ही तो मांगा था तूने धोखा दिया सो खा बैठे

दिल-ओ-दिमाग़ पर हुकूमत है करता, पेट कहने को ही मातहत है
घर में चूल्हा जलाने की ख़ातिर लोग लहू क्या घर ही जला बैठे

हर जगह बेबसी का है आलम हर तरफ़ है यही शोर बरपा
क्या करने चले थे जब चले थे, आज पहुंचे यहां कर क्या बैठे

शकल में और अस्ल में और हैं, मुंह में कुछ है बगल में कुछ है
गोल खम्भों के अपने गोल घर में हम किस किस को हैं बिठा बैठे

उसकी ज़ुल्फ़ों का क़ुसूर है सब, दराज़ इतनी अगर ये बहर है
और ख़म इस कदर कि ग़ज़ल का रदीफ़ उठे तो क़ाफ़िया बैठे

Rush

मैं बोल रहा हूं इसलिए चुप होकर
तुम अपनी बारी के इंतज़ार में हो
तुमने अपने आपको बोलते सुना है कभी?
तुमने किसकी सुनी है कि सुनोगे अपनी?
तुम्हारी धड़कनें तुम्हारे कान को तरसती हैं
तुम सुनते नहीं उनके रक्तचाप होने तक
तुम्हारी लाइफ़ है, ये तुम्हारा स्टाइल है
लाइफ़स्टाइल डिज़ीज़ होने तक

घर से दफ़्तर के बीच बांई तरफ़ पेड़ है एक
उस पर इस बार भी नीले फूल खिले हैं
रेडलाइट पर भीख मांगने वाली लड़की
आज नहीं थी, आगे भी नहीं आएगी
तुम जब नए बहाने की उधेड़बुन में थे
लाइट कब ग्रीन हुई ये भी तुम्हें याद नहीं
तुम्हारे दफ़्तर पहुँचने तक
एक दफ़्तर होता है तुम्हारे भीतर,
जहां तुम व्यस्त रहते हो या व्यस्त दिखते हो

लाॅन्ग ड्राइव का क़िस्सा तुम्हें याद है
ड्राइव का कोई हिस्सा तुम्हें याद नहीं
रास्ता देखता रहता है तुम्हारा रस्ता
तुम बढ़े जाते हो मंज़िल की तरफ़
और तुम्हें सब खेत, नहर
रिअर व्यू मिरर से देखते हैं
क्या कभी तुमने उन्हें देखते हुए देखा है?
जिस झील के फ़ोटो फ़ेसबुक पर अपलोड किए
उस झील के शांत पानी पर
कितने चेहरे नावों की तरह तैरते हैं
उन सब ने तुम्हें देखते हुए देखा है
कैसे तुमने हैलो तक नहीं कहा उनको

आॅफिस की पार्टी के लिए अपने बग़लों पर
डनहिल डिज़ायर छिड़क कर जब निकले
कार का शीशा चढ़ा रखा था
परफ़्यूम गर उड़े गाड़ी में रहे
रजनीगंधा रोती रही गली के कोने में
उसकी नाकामी पर चाँद हंसता रहा।
तुम्हें याद है पिछली बार सांस कब ली थी
लिफ़्ट ख़राब थी दफ़्तर की उस दिन
या फिर घूमने गए थे जब हिल स्टेशन
सांस है इसलिए ही ज़िन्दा हो
तुम्हें सब याद है ज़िन्दगी के सिवा

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Pursuit of Happiness

Her absence is the void
The feeling of her absence fills
From corner to corner
Leaving no space
for any feeling else
Her absense is a presence
overwhelming
The absence of joy
isn’t sorrow
Melancholy is
Quest of happiness
The quest born
of the feeling of absence,
not absence itself
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In pursuit of happiness
Pursuit is the content
happiness just intent
I am loneliness
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उसके ना होने का एहसास
दिन-रात, शाम-ओ-सहर
ज़हन में रहता है
उसी का घर है
उसके ना होने का एहसास
अगर ना हो
तो बहुत जगह है
हसरतों को कुछ होने के लिए
बहुत ज़मीन है
नए ख़्वाब बोने के लिए

उसके ना होने का एहसास
मुझे इतना है
कि मैं हर वक़्त
उसी की तलाश में हूं
ख़ुशी मेरे हर दुख का सबब है
मैं ख़ुशी की तलाश में हूं।
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होना या ना होना ख़याल है बस
होने ना होने का एहसास हक़ीक़त
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Presence or absence are perceptions
What’s felt is all that’s real
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Eternal

bargad

तुम्हारे हिज्र में वैसे तो ग़म-ए-बेहद हूँ
तुम जो आए हो तो आज बहुत गदगद हूँ

सराय है दुनिया जहां से आदमी का
रफ्त जो हुआ मैं हूँ, मैं ही आमद हूँ

गर्दिशें थकें तो करती हैं आराम यहाँ
सुकून के लिए अय्याम का मैं मसनद हूँ

मैं दिलदार हूँ तो अहल-ए-दिल के वास्ते
बेदिली हो तो फिर फ़ितना-ए-आदमकद हूँ

एक डोर हूँ जिसका सिरा कोई भी नहीं
एटर्नल हूँ, सनातन हूँ, मैं तो अनहद हूँ

आवाज़-ए-हक़ को आहनी हुदूद से क्या
बाड़ के बस में नहीं हूं मैं तो बरगद हूँ।

Sahar

यूं हुआ कि फिर वो बात उम्र भर ना हुई।
हुई जो रात तो फिर रात की सहर ना हुई।

तुम्हारे करम के क़िस्से हैं हर तरफ़ फैले,
ये और बात है हम पर कभी मेहर ना हुई।

हुआ यूं नीमनूर अपनी तमन्ना का चिराग़,
अंधेरी रात में भी ख़्वाहिश-ए-क़मर ना हुई।

मरहम-ए-वक़्त वहम है देखो वक़्त के साथ,
हमारी हालत तो बदतर हुई, बेहतर ना हुई।

तुमसे मिलकर जैसे बेसाख़्ता आई थी ख़ुशी,
फिर और किसी से कभी मिलकर ना हुई।

तुमने छोड़ा तो घटाओं ने बहुत साथ दिया,
ऐसी बरसात किसी से भी बिछड़कर ना हुई।

हमारी दरकिनार हो गईं दुआएं सब
तुम्हारी बद्दुआ ही थी जो बेअसर ना हुई।

तेरी नज़र कभी शबनम तो कभी शोला है
नसीब मेरे ग़ज़ल को सही बहर ना हुई।

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A cat. And dogs. And gods.

1.

तुम्हें आना ही था, तुम आते ही
पर तुम आए तो बिन बताए आए
पूरी कोशिश की कि तुमसे पहले
तुम्हारी आहट ना पहुंचे हम तक
तुम्हारे तलवों में मखमल के गद्दे
दबा के रखते हैं आवाज़-ए-पा सब।
अलसाई भोर बालकनी में खड़ी
ओढ़े कोहरे की एक पतली चादर
तुमने कुछ कहा, शायद गुड मॉर्निंग
गुड मॉर्निंग टु यू टू
मेरे भी शब्द तुषार से निकले
तुम्हारे लफ़्ज़ों के गुबार से गले मिलने
हम कुहासे की भाषा में बात करने लगे!

2.

अब बताओ कहाँ बिताए दिन
और क्या रंगीन वहाँ रातें थीं
जहाँ घूमे ये नौ महीने तुम
जब हम ने प्यार में धोखा खाया
फरवरी की नर्माहट एक छलावा
कुछ दिनों में ही मई जून बना,
पालथी मार बैठ गया छाती पर
आसमां वाला भी पसीज गया
हम भी खूब रोए उन घटाओं के साथ
दिन-रात तपते रहे आग में जुदाई की
दिन-रात हमने तुम्हें याद किया

3.

आओ तजदीद-ए-मुहब्बत कर लें
गुनगुनाएं एक गुनगुनी रजाई में
गीत नजीर के, तिल के लड्डू खाएं
साज सब दांत, तबले पर संगत देंगे
सुन्न हाथों को मिलेंगे नए दस्ताने
नाक बहेगी तो गर्म चाय की सुड़की लेंगे
आँख बहेगी तो फिर सर्द होंगे अफ़साने

3.1

कि जो खुद को ही ओढ़ते बिछाते हैं
आसमां की छत, फुटपाथ का गद्दा
थकी थकान का तकिया लगा सो जाते हैं
उनकी दिसंबर में सदियों के कांटे हैं बहुत
एक गोला ऊन नहीं है कि कोई ख़्वाब बुनें
जनवरी, तुम कांटे सा चुभते हो उन आँखों में
और मुझको ये बात बहुत चुभती है

3.2

ये भी कि वो नहीं मांगते हैं
ठिठुरे होठों पर जम चुके सवालों के जवाब,
उनको मालूम नहीं, तुम्हें प्यार करें या न करें
इतना मालूम कि जन्मों का हिसाब है जो
कई जन्मों तक वसूला जाएगा,
कि जो खा रहे हैं ढाबे का ठंडा जूठन
ये उनके कर्मों का फल है या इंतज़ार का फल
मीठा लगता है भूखे को सबकुछ,
कुछ भी कड़वा नहीं लगता सच में
फिर वही रात, नई जंग कुदरत के खिलाफ
सड़क के बीचोबीच एक नो मैन्स लैंड में
घुटने ठोड़ी तक ला आदमी गोल हुआ
ट्रैफिक लाईट के ठूंठ की ओट में
ये जंग देख तुम्हारी भी रूह कांपी थी
तुम थे फ़रकोट में, मैं भी फ़रकोट में

Spaces

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इसी का रोना था
घर बहुत ही छोटा है
एक कमरे का घर नहीं होता
खोली है़, दड़बा है।
बड़े घर का सपना
पूरा हुआ तो अब
बहुत स्पेस है
रोने के लिए।

जो भी मिलता है
वही कहता है
कि मैंने लूज़ किया है
वज़न थोड़ा
या फिर बढ़ गया है
कुछ करो बाॅस
मैं २१ ग्राम का कल भी था
आज भी हूँ।
मैं छोटा हो गया हूँ
बड़ा हुआ है जब से घर।

आदमी और उसके ख़्वाब का घर
दोनों के बीच ख़्वाब भर की दूरी है
अव्वल तो हासिल ही नहीं
हासिल तो रहना मुश्किल
आदम और बाग़-ए-जन्नत के बीच
मुकेश और एंटीलिया के बीच
वही दूरी बनी रहती है
फूस के छप्पर को कंकरीट के ख़्वाब
ग्लास-क्रोम वाले को ग्रीन होम की चाह
कितनी मुहब्बत से मकान घर बनता है
जहाँ से देखते हैं हम नए मकानों को
नींव डालते हैं नए अरमानों के

Unfulfilled

आइने टूटे थे जो उस रात तब ना जाने कब
मेरे पांवों में चुभ गया था टुकड़ा शीशे का
फिर मेरे कदम जहाँ पड़े, मैं लिखता गया
अपने ज़ख्मों की कहानी लहू से अपनी ही
नामुकम्मल है अभी भी वो किताब मेरी
जिसमें एक सफ़ा है वफ़ा के नाम से भी
ज़िक्र उसमें तुम्हारा है और मेरा भी
उस पे चस्पां है शीशे का वो टुकड़ा भी
तुम्हारा अक्स जिसमें अब तक है!

जफ़ा तो जब हो कि वफ़ा भी हो,
बिछड़े वो तब, जब मिला भी हो
तन मिले थे, मन मिले थे क्या
मन मिले थे तो फिर गिले क्यों हैं
अलग हुईं थी राहें या हमने कर डालीं
इस बात पर बहस-मुबाहिसा करो ना करो
राह हसीन है मगर मंज़िल को नहीं जाती है,
अगर मंज़िल को है तो रस्ता हसीन हो या ना हो!

तुम्हारे ख़्वाब के ताबीर भी अधूरे हैं
मेरा भी ताजमहल हो सका तामीर नहीं
कहाँ का शाह-ए-जहाँ, देख पैरहन मेरा
एक इबारत सी लिख रखी है पैबन्दों ने
बीते हुए लम्हों की जबानी जिसमें
अफ़सुर्दा रातों के कितने स्याह किस्से हैं
इस इन्तज़ार में कि तुम आओगे, सुनोगे कभी
इस ऐतबार से कि तुम ही समझ पाओगे!

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Shikwa

वैसे तुम से है मुझे प्यार बहुत
मैं कुछ दिनों से हूँ बेज़ार बहुत

हुस्न ने जान की कीमत मांगी
महंगा है सच ये कारोबार बहुत

जिसको देखो तपा-तपा सा है
चढ़ा है इश्क का आज़ार बहुत

उनकी ज़ुल्फ़ों में कोई बात तो है
एक-एक ख़म में गिरफ़्तार बहुत

मेयार-ए-चश्म-ए-यार, क्या कहिए
मिकदार जो भी हो, खुमार बहुत

कमर में धार वो कि सीना चाक
दिल को सीने में भी अय्यार बहुत

रिबा-ए-दर्द का हिस्सा ना लिया
मियां तुम निकले ज़ियांकार बहुत

देख ली आपकी भी सरदारी
सर्द निकले मेरे सरकार बहुत

लहू से हाथ रंगे हैं जिस के
हर तरफ़ उसके तरफ़दार बहुत

ये सच नहीं कि ऐतबार नहीं
कर लिया हमने इंतज़ार बहुत

आँधियां ले गई सर से छत को
बारिशों के भी हैं आसार बहुत

बुलहवस बदमिज़ाज दुनिया में
आदमी हो गया लाचार बहुत

चमन समन हुआ बहार आई
आए खुशबू के खरीदार बहुत

गुलों से अपना खूं का रिश्ता है
खार क्यूँ खाएं जो हैं ख़ार बहुत

फिर वही मुश्किलें मुकाबिल हैं
अनार एक और बीमार बहुत

किस्सा-ए-दर्द मुख्तसर बेहतर
कौन सुनता हैं यहाँ यार बहुत