Kuchh Bhi Nahin Hai

A Tribute to Ghouse Khwamkhwah. This is on his zameen:
Duur ke dhol suhaane baj rahe kuchh bhi nahin hai kya bhai nahin hai

दूर के ढोल सुहाने बज रै कुछ भी नइं है क्या भी नइं है
लोगां हैं सो गप्पां कर रै कुछ भी नइं है क्या भी नइं है

इश्क में हमरे मर के देखो जन्नत का दीदार मिलेगा
इश्क में हमने मर के देखा कुछ भी नइं है क्या भी नइं है

पांच साल तुम दइ के देखो अच्छे दिन हम लइ आएंगे
पंचवां जाते जाते बोला कुछ भी नइं है क्या भी नइं है

दिल का ही वो सच्चा नइं है साफ शफ्फाक है कुर्ते सा
दिमाग अंदर भी झांक देखो तो कुछ भी नइं है क्या भी नइं है

लिट के फेस्ट कुकुरमुत्ते से शहर शहर में हिट हो गए
फेस्ट में लिट को ढूंढते रहियो कुछ भी नइं है क्या भी नइं है

हिंदू मुस्लिम मंदिर मस्जिद भौंक भौंक के थकते नइं
टीवी पो भी बहस के भीतर कुछ भी नइं है क्या भी नइं है

सियासत कू चक्कर में कायकू टेम खराब है रोते हो
प्याज को छिलके छिलते जा रै, कुछ भी नइं है क्या भी नइं है

गांव के लोग शहर को भागें, शहर के लोग गांव कू ताकें
अंदर सब कुछ क्या का क्या है, कुछ भी नइं है क्या भी नइं है

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