Ram Ram

Asaram Bapu / image courtesy Indian Express

आ के अब आराम नहीं है,
बिपदा घनी है बिराम नहीं है।

जिस पर हमनें सुबहें वारीं,
नहीं नहीं ये वो शाम नहीं है।

सावन में अंखियां ही बरसी,
उफ़ुक पे भी घनशाम नहीं है।

कलजुग में कल कैसे पावैं,
आज का जब अंजाम नहीं है।

मय मय है मयखाना लेकिन,
तश्नालब को जाम नहीं है।

गुलशन में मातम का आलम,
गुल है मगर गुलफाम नहीं है।

आसा टूटी भरोसा टूटा,
काम पे कोई लगाम नहीं है।

संतन रूप में रावण घूमैं,
आ राम, आराम नहीं है।

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2 Comments

  1. धर्म के आवरण में कुकर्मों की फसल इस बाजारवादी अर्थव्यवस्था की ही देन है। बावजूद कहीं धर्म बचा है। आप इसे इंसानी जज्बा कह सकते हैं। इस जज्बे को बार-बार सलाम! एक आम आदमी का क्षोभ और दर्द यक़ीनन यहाँ अक्स पाता है।

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