Worshipping you to death

1.

ये जो भावनाएं आहत हैं, अकारण नहीं हैं
मंदिर और टॉयलेट की तुलना कर दी!
पवित्र और अपवित्र एक ही वाक्य में
तो विन्यास की आवश्यकता क्या है?
अक्षम्य अपराध है, संस्कृति पर चोट है,
हाँ इस देश में मंदिर बहुतायत में हैं,
पर हमारे हैं, जैसे ये देश हमारा है,
जहाँ हरे हरे खेत हैं, जहाँ सुबह होती है
जहाँ खेत नहीं है, वहाँ सरकार ने रेलवे लाइन बिछवाई है.

मंदिर हमारे हैं, परिसर हमारा है,
लाइन में खड़े लोगों की पीकें,
अड़े पानी की सड़ांध,
औंधे पड़े भिखारियों के कोढ़ की कराह,
पंडों के भ्रष्ट गर्दन की मैल,
भाग्य के मारों का ब्लैकमेल,
ये सब भगवान के सामने होता है, पीठ पीछे नहीं.
जब परम-पूज्य परमात्मा माइंड नहीं करते
तो किसी मंत्री-संत्री को अधिकार किसने दिया है
इस तरह का अनर्गल प्रलाप करने का

अपवित्रता नहीं होगी तो पवित्र क्या होगा,
कीचड़ में ही कमल खिलता है,
कमल पर ही भगवान विराजते हैं,
साफ़ तो घर होते हैं पूजा करने वालों के,
टाइल वाले बाथरूम में
नए हार्पिक की बस एक बूँद,
गार्डन के फूलों में ड्राइंग रूम सा अनुशासन,
हर बेडरूम में एयर फ्रेशनर,
टॉयलेट में लैवेंडर की भीनी खुशबू

भगवान का घर है, मनुष्य का नहीं,
यहाँ अपवित्र भी पवित्र है,
पर अगर यह ईश्वर का नहीं,
किसी हरेश-सुरेश-रमेश का घर होता तो?
क्या नाक पर हाथ रख मन्त्र बुदबुदाते?
क्या स्वच्छता का यही मापदंड होता?

2.
हज़ारों करोड़ रूपए बहा गई,
लाखों करोड़ पापों के साथ,
सात-सात जन्मों के पाप
एक डुबकी में साफ़ करती है जो,
उसकी सफाई के नाम पर
खज़ाना साफ़ होता है,
दुनिया की पवित्रतम नदी,
और सबसे प्रदूषित भी,
भटकती आत्माएं, फूले सड़े,
बू मारते शरीर जानवरों के, मनुष्यों के,
मल-मूत्र, पूजा के फूल
सब समा जाते हैं माँ की गोदी में,
गंगा अगर पवित्र ना होती तो
क्या इतनी मैली होती?

3.

जिस कदम्ब के ऊपर,
श्याम बंसरी बजाते थे,
और गोरी राधा दूधिया कॉन्ट्रास्ट देती थी,
उसके नीचे अब एक
गन्दा नाला बहता है,
ताज की विस्मयकारी श्वेत शिलाओं को
कॉन्ट्रास्ट मुहैया कराता है
आँखें फाड़ हम ताज को देखते हैं,
नाक पर रूमाल रखे,
यमुना को अगर हम नहीं पूजते
तो क्या वह बन पाती गन्दा नाला?

4.
अखबारों के पन्नों में नखरे दिखाती है
विदेश तक में भारत का नाम होता है
ट्राफिक आइलैंड पर बैठ पगुराती है
ट्रकों, बसों, कारों से बचती
कूड़े घर को तलाशती भटकती
दिन में किलो भर पोलीथीन चबा जाती है
निगम वाले पकड़ते छोड़ते हैं,
जिस दिन ट्राले की चपेट में आ जाती है
सड़क पर तड़पती है, निगम वाले ही उठाते हैं,
गाय अगर माता नहीं होती
तो क्या पोलीथीन खा कर आत्महत्या करती?

5.
जब हार जाता है आदमी
तो पेशानी पर उभरी लकीरें
मस्तिष्क पर गहरा घाव करती है,
अपने हाथों से छू कर सारे घाव भरती है
उस हाथ को लोग जुए में हार जाते हैं,
बेटा पैदा करनेवाली मशीन ना निकली
तो पंखे से झूल जाती है,
बाज़ार में बिकती है, पिटती है, मिटती है,
उसके जीने की जो भी सीमाएं हैं,
उसे लक्ष्मण रेखा मान खुश रहती है,
रेखा के भीतर वो घुटती है, बाहर हो लुटती है
अगर नारी पूजनीय नहीं होती,
तो क्या इतनी प्रताड़ित होती?

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