Sahar

यूं हुआ कि फिर वो बात उम्र भर ना हुई।
हुई जो रात तो फिर रात की सहर ना हुई।

तुम्हारे करम के क़िस्से हैं हर तरफ़ फैले,
ये और बात है हम पर कभी मेहर ना हुई।

हुआ यूं नीमनूर अपनी तमन्ना का चिराग़,
अंधेरी रात में भी ख़्वाहिश-ए-क़मर ना हुई।

मरहम-ए-वक़्त वहम है देखो वक़्त के साथ,
हमारी हालत तो बदतर हुई, बेहतर ना हुई।

तुमसे मिलकर जैसे बेसाख़्ता आई थी ख़ुशी,
फिर और किसी से कभी मिलकर ना हुई।

तुमने छोड़ा तो घटाओं ने बहुत साथ दिया,
ऐसी बरसात किसी से भी बिछड़कर ना हुई।

हमारी दरकिनार हो गईं दुआएं सब
तुम्हारी बद्दुआ ही थी जो बेअसर ना हुई।

तेरी नज़र कभी शबनम तो कभी शोला है
नसीब मेरे ग़ज़ल को सही बहर ना हुई।

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A cat. And dogs. And gods.

1.

तुम्हें आना ही था, तुम आते ही
पर तुम आए तो बिन बताए आए
पूरी कोशिश की कि तुमसे पहले
तुम्हारी आहट ना पहुंचे हम तक
तुम्हारे तलवों में मखमल के गद्दे
दबा के रखते हैं आवाज़-ए-पा सब।
अलसाई भोर बालकनी में खड़ी
ओढ़े कोहरे की एक पतली चादर
तुमने कुछ कहा, शायद गुड मॉर्निंग
गुड मॉर्निंग टु यू टू
मेरे भी शब्द तुषार से निकले
तुम्हारे लफ़्ज़ों के गुबार से गले मिलने
हम कुहासे की भाषा में बात करने लगे!

2.

अब बताओ कहाँ बिताए दिन
और क्या रंगीन वहाँ रातें थीं
जहाँ घूमे ये नौ महीने तुम
जब हम ने प्यार में धोखा खाया
फरवरी की नर्माहट एक छलावा
कुछ दिनों में ही मई जून बना,
पालथी मार बैठ गया छाती पर
आसमां वाला भी पसीज गया
हम भी खूब रोए उन घटाओं के साथ
दिन-रात तपते रहे आग में जुदाई की
दिन-रात हमने तुम्हें याद किया

3.

आओ तजदीद-ए-मुहब्बत कर लें
गुनगुनाएं एक गुनगुनी रजाई में
गीत नजीर के, तिल के लड्डू खाएं
साज सब दांत, तबले पर संगत देंगे
सुन्न हाथों को मिलेंगे नए दस्ताने
नाक बहेगी तो गर्म चाय की सुड़की लेंगे
आँख बहेगी तो फिर सर्द होंगे अफ़साने

3.1

कि जो खुद को ही ओढ़ते बिछाते हैं
आसमां की छत, फुटपाथ का गद्दा
थकी थकान का तकिया लगा सो जाते हैं
उनकी दिसंबर में सदियों के कांटे हैं बहुत
एक गोला ऊन नहीं है कि कोई ख़्वाब बुनें
जनवरी, तुम कांटे सा चुभते हो उन आँखों में
और मुझको ये बात बहुत चुभती है

3.2

ये भी कि वो नहीं मांगते हैं
ठिठुरे होठों पर जम चुके सवालों के जवाब,
उनको मालूम नहीं, तुम्हें प्यार करें या न करें
इतना मालूम कि जन्मों का हिसाब है जो
कई जन्मों तक वसूला जाएगा,
कि जो खा रहे हैं ढाबे का ठंडा जूठन
ये उनके कर्मों का फल है या इंतज़ार का फल
मीठा लगता है भूखे को सबकुछ,
कुछ भी कड़वा नहीं लगता सच में
फिर वही रात, नई जंग कुदरत के खिलाफ
सड़क के बीचोबीच एक नो मैन्स लैंड में
घुटने ठोड़ी तक ला आदमी गोल हुआ
ट्रैफिक लाईट के ठूंठ की ओट में
ये जंग देख तुम्हारी भी रूह कांपी थी
तुम थे फ़रकोट में, मैं भी फ़रकोट में

Spaces

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इसी का रोना था
घर बहुत ही छोटा है
एक कमरे का घर नहीं होता
खोली है़, दड़बा है।
बड़े घर का सपना
पूरा हुआ तो अब
बहुत स्पेस है
रोने के लिए।

जो भी मिलता है
वही कहता है
कि मैंने लूज़ किया है
वज़न थोड़ा
या फिर बढ़ गया है
कुछ करो बाॅस
मैं २१ ग्राम का कल भी था
आज भी हूँ।
मैं छोटा हो गया हूँ
बड़ा हुआ है जब से घर।

आदमी और उसके ख़्वाब का घर
दोनों के बीच ख़्वाब भर की दूरी है
अव्वल तो हासिल ही नहीं
हासिल तो रहना मुश्किल
आदम और बाग़-ए-जन्नत के बीच
मुकेश और एंटीलिया के बीच
वही दूरी बनी रहती है
फूस के छप्पर को कंकरीट के ख़्वाब
ग्लास-क्रोम वाले को ग्रीन होम की चाह
कितनी मुहब्बत से मकान घर बनता है
जहाँ से देखते हैं हम नए मकानों को
नींव डालते हैं नए अरमानों के

Unfulfilled

आइने टूटे थे जो उस रात तब ना जाने कब
मेरे पांवों में चुभ गया था टुकड़ा शीशे का
फिर मेरे कदम जहाँ पड़े, मैं लिखता गया
अपने ज़ख्मों की कहानी लहू से अपनी ही
नामुकम्मल है अभी भी वो किताब मेरी
जिसमें एक सफ़ा है वफ़ा के नाम से भी
ज़िक्र उसमें तुम्हारा है और मेरा भी
उस पे चस्पां है शीशे का वो टुकड़ा भी
तुम्हारा अक्स जिसमें अब तक है!

जफ़ा तो जब हो कि वफ़ा भी हो,
बिछड़े वो तब, जब मिला भी हो
तन मिले थे, मन मिले थे क्या
मन मिले थे तो फिर गिले क्यों हैं
अलग हुईं थी राहें या हमने कर डालीं
इस बात पर बहस-मुबाहिसा करो ना करो
राह हसीन है मगर मंज़िल को नहीं जाती है,
अगर मंज़िल को है तो रस्ता हसीन हो या ना हो!

तुम्हारे ख़्वाब के ताबीर भी अधूरे हैं
मेरा भी ताजमहल हो सका तामीर नहीं
कहाँ का शाह-ए-जहाँ, देख पैरहन मेरा
एक इबारत सी लिख रखी है पैबन्दों ने
बीते हुए लम्हों की जबानी जिसमें
अफ़सुर्दा रातों के कितने स्याह किस्से हैं
इस इन्तज़ार में कि तुम आओगे, सुनोगे कभी
इस ऐतबार से कि तुम ही समझ पाओगे!

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Shikwa

वैसे तुम से है मुझे प्यार बहुत
मैं कुछ दिनों से हूँ बेज़ार बहुत

हुस्न ने जान की कीमत मांगी
महंगा है सच ये कारोबार बहुत

जिसको देखो तपा-तपा सा है
चढ़ा है इश्क का आज़ार बहुत

उनकी ज़ुल्फ़ों में कोई बात तो है
एक-एक ख़म में गिरफ़्तार बहुत

मेयार-ए-चश्म-ए-यार, क्या कहिए
मिकदार जो भी हो, खुमार बहुत

कमर में धार वो कि सीना चाक
दिल को सीने में भी अय्यार बहुत

रिबा-ए-दर्द का हिस्सा ना लिया
मियां तुम निकले ज़ियांकार बहुत

देख ली आपकी भी सरदारी
सर्द निकले मेरे सरकार बहुत

लहू से हाथ रंगे हैं जिस के
हर तरफ़ उसके तरफ़दार बहुत

ये सच नहीं कि ऐतबार नहीं
कर लिया हमने इंतज़ार बहुत

आँधियां ले गई सर से छत को
बारिशों के भी हैं आसार बहुत

बुलहवस बदमिज़ाज दुनिया में
आदमी हो गया लाचार बहुत

चमन समन हुआ बहार आई
आए खुशबू के खरीदार बहुत

गुलों से अपना खूं का रिश्ता है
खार क्यूँ खाएं जो हैं ख़ार बहुत

फिर वही मुश्किलें मुकाबिल हैं
अनार एक और बीमार बहुत

किस्सा-ए-दर्द मुख्तसर बेहतर
कौन सुनता हैं यहाँ यार बहुत

Apna Pun Jab Ho Way

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फूल ने फ़ूल को फ़ूल कहा,
फ़ूल ने फूल सुना, फूल गया,
मीठी लगती है फ़ूल को फूल की नुक़्ताचीनी भी।

कर्मण्ये वाधिकारस्ते
मा फलेषु कदाचन
फलों का राजा, लँगड़ा।

स नी मा पा पा
धा रे मा गा गा
सनीमा, संगीत।

चार आने में
मेले के मज़े
आने नहीं।

तुम्हारी जीत,
मेरी हार,
तुम्हारा हार।

पिया परदे सी, पिया परदे सी,
पिया परदेसी ने पिया परदेसी,
खूब फबती है पिया पर देसी।

बाल-बाल बच गए, सब ठीक-ठाक रे,
बाल बाँका ना हुआ, बच गई नाक रे,
बैरी जग, तू भी जग, बाल बना, बाँका बन।

वो हाथ धरती है
मेरे सर पर,
वो हाथ धरती है।

कटे हैं पर
कटे नहीं हैं,
उड़ रहा हूँ मैं।

तुम सोना चाहते हो,
तुम्हें जागना पड़ेगा,
मैं सोना चाहता हूँ।

जायफल
जो जाय फल
तो जाय फल।

जल बिन मछली,
जल जाती है,
अनजानी सी आग में।

बढ़ना घटना,
घटना घटना,
बढ़। घट ना।

मन भारी है,
एक मन भारी
वज़न है मन पर।

तन तना है तने का, तना तना है अभी,
फल लगेंगे झुक जाएंगीं डालियाँ तनातन
तना तना रहेगा, तन कर खड़ा रहेगा।

काम का मारा आदमी
काम का मारा
कोई सूत्र काम नहीं आता।

जो खाते हैं,
उनके खाते हैं,
स्विस बैंक में।

नाना प्रकार के
होते हैं नाना,
एक पाटेकर भी।
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छुरी घायल करती है, कांटे चुभते हैं,
हथियारों से नहीं, हाथ से खाता आदमी,
“खाते-खाते हँसता है, मैनर्स नहीं है?”
“मैनर्स हैं, वेस्टर्न नहीं हैं बस”,
लो ये खाते-खाते बोलता भी है।

The Common, The Aam

किसी के साथ इनका हाथ। किसी के हाथ इनका साथ। किसी की पार्टी की हैं शान, किसी की पार्टी का हैं नाम। जिनका चिन्ह है अरविंद उनके पुराने हो गए राम, जिसको देखो वही पुकारे जय श्री आम। जय श्री आम। आम चरित मानस की रचना तो कोई नया तुलसी करे पर चरित-रहित राजनीति के मानस का राजा आम है। आज खास नहीं, पेश है एक आम पेशकश।

    आम का नाम बदनाम ना करो

खाने वाले ख़ास हैं, आम है बदनाम है।
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

घर में कोई काट रहा, लोगों में बाँट रहा,
हाथों से दबा दबा पिलपिले को छाँट रहा,
जिसके भी हाथ लगा चूस लिया छोड़ दिया,
रेशे में रस जो बचा घूस सा निचोड़ लिया,
रह गई गुठली सो उसका भी दाम है,
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

हाथों में आम है या आमों का हाथ है,
गिनती ही बतावेगी कौन किसके साथ है,
हरे-हरे आम जाने किसके साथ जाएँगे,
सफ़ेदा ये सोच रहा हम किसको भाएँगे,
केसरिया उलझन में आम नया राम है
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

सीजन शुरू हुआ तो बौराए ख़ूब थे,
आम के किसानों के हौसले मंसूब थे,
मंज़र यूँ बदला कि मंजर नहीं बचे,
फूल कर कुप्पा थे फूल भर नहीं बचे,
मौसम जो करवट ले, किस्सा तमाम है,
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

दागी हुए आमों का कौन ख़रीदार है,
फिर भी ये राजा हैं, इनकी सरकार है,
चुस गए चौसाजी युवा हृदय सम्राट हैं,
कहने को लंगड़े हैं, भागते फर्राट हैं,
तोतापुरी सोच में है, चोंच का ग़ुलाम है।
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

सियासत की फाँस में अल्फांसो फँस गया,
दिल्ली की दलदल में किशनभोग धँस गया,
दशहरी* रोती रही सदर बाज़ार में,
व्यस्त रहा संसद आम के व्यापार में
सिंदूरी जरूर है पर सुबह है या शाम है?
आम आदमी है या आदमी ही आम है।

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*आम पुल्लिंग है, आदमी की तरह। पर दशहरी यहाँ स्त्रीलिंग हो गया/गई है, बाजार के हवाले से। आम भी वैसे ही लचीला है, आप जैसा समझें।

All that is you

नूर-ए-सुब्ह हो मेरे, सुकून-ए-शब हो तुम,
तुम्हें जिस रंग में देखूं गरां ग़ज़ब हो तुम।

मेरे सब ज़ख़्म तुम्हें हंस के दुआ देते हैं,
मेरी सब मुस्कुराहटों के भी सबब हो तुम।

गुलाब, ख़ार, दवा, दर्द, खिजां, अब्र-ए-बहार
मेहर हो, क़हर हो, शाम, सहर, सब हो तुम।

तुम्हारे दश्ते तलब में सराब झिलमिल हैं,
जैसा मैं हूँ क्या वैसे तश्नालब हो तुम?

पलकें जो बंद करूँ तुम ही नज़र आते हो,
मैं तुमसे दूर हूँ पर मुझसे दूर कब हो तुम?

मेरा वजूद है सुजूद तेरे सजदे में
आगे क्या कहूँ कह दिया कि रब हो तुम।

तर्क-ए-तआल्लुक़ का ख़याल अस्ल में तुम्हारा था,
अब तुम ही रोते हो, काकिसी अजब हो तुम!

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नूर-ए-सुब्ह: भोर की किरण | सुकून-ए-शब: रातों का सुकूं | गरां ग़ज़ब: बड़ी गज़ब | ख़ार: कांटे | खिजां: पतझड़ | अब्र: बादल  |

दश्ते तलब: चाह का रेगिस्तान | सराब: मृगमरीचिका | तश्नालब: प्यासा | सुजूद: सजदे की अवस्था | तर्क-ए-तआल्लुक़: रिश्ते तोड़ना

Longing

(To Ibn-e-Insha)

एक तो वैसे ही मुश्किल थी डगर क्या कीजै,
हमसफ़र छोड़ गया बीच सफ़र क्या कीजै।

कि जिसके मुंतज़िर गुज़री ये उमर क्या कीजै,
उसी को नहीं मेरे हालत की खबर क्या कीजै।

असीर-ए-ज़ुल्फ़ हुए जो कभी छूटे ही नहीं
ज़ीस्त गर ज़ुल्फ़ बने ज़ोर-ओ-जबर क्या कीजै।

हमारा फ़र्ज़ था उस दर से दुआ मांगें हम
वो अपने फ़र्ज़ से जो जाए मुकर क्या कीजै।

मात खाई तो अक्ल आई कि इश्क बाज़ी में
काम ना आए अक्ल, ना ही हुनर क्या कीजै।

दुआ-ए-मर्ग दे ऐ चारागर जो देना है
मरीज़-ए-इश्क को दवा औ असर क्या कीजै।

मकीं हुआ है वो रकीब रकबा-ए-दिल पर
अपना ही नहीं दिल अपना अगर क्या कीजै।

साँस सब खर्च के इलहाम हो गर क्या कीजै
माल-ओ-ज़र क्या कीजै, अलमास-ओ-गौहर क्या कीजै।

तौबा भी करते रहे हम हरेक गुनाह के बाद,
फ़रिश्ते उलझन में हैं रोज़-ए-हशर क्या कीजै।

साकिया खुम-ओ-सुबू सब हैं तेरी आँखों में,
हमारे लब ही नहीं ज़ेर-ए-नज़र क्या कीजै।

‘का किसी’ से कहें, सच कह के गए इंशाजी,
सुकूं वहशी को औ जोगी को नगर क्या कीजै।

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मुंतज़िर: इंतज़ार में | असीर-ए-ज़ुल्फ़: ज़ुल्फ़ के कैदी | ज़ीस्त: ज़िंदगी | ज़ोर-ओ-जबर: शक्ति का प्रयोग | बाज़ी: खेल |
दुआ-ए-मर्ग: मरने की दुआ | चारागर: चिकित्सक | मकीं: रहने वाला | रकीब: दुश्मन | रकबा-ए-दिल: दिल की ज़मीन | इलहाम: ज्ञान |
माल-ओ-ज़र: धन-दौलत | अलमास-ओ-गौहर: हीरे-मोती | रोज़-ए-हशर: क़यामत का दिन | खुम-ओ-सुबू: शराब | ज़ेर-ए-नज़र: ध्यान में

Collateral Damage

You infiltrate into my world
Sneak in
Under the cover of darkness
Into my heart
where it snows through the year
You fire your questions
I retaliate with mine
The innocent answers
Are taken hostage
In the battlefield
Mined with betrayals
Like bullets, accusations fly
And the answers die

I wish we could meet in sunshine
On a bright day, you can see
How much I have bled,
And I can see your face
And the wounds, the bitterness
that I have only a smell of
When we engage in the fiercest fight ever
To slay the past, at last
Your place or mine,
I wish we could bring in some sunshine
Because here, it snows through the year

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तुम दबे पाँव आते हो
अंधेरे की चादर में छिपते-छिपाते
घुसपैठ करने मेरे खाना-ए-दिल में
जहां बरस भर बर्फ़बारी का मौसम रहता है
सवालों की शक्ल में गोलियाँ बरसाते
सामना करता हूँ उनका सवालों से मैं
और हमारे निर्दोष जवाब
मूक बंधक बन जाते हैं
लड़ाई के इस मैदान में
यादों, वादों के बारूदी सुरंगों के बीच
आरोपों के कारतूस सांय-सांय, दाँए बाएँ
और सब जवाब वहीं ढेर हो जाते हैं

काश कभी होते आमने-सामने
दिन के उजाले में
सूरज की नर्म धूप के साए में
तुम देख पाते मेरे सदचाक बदन पर
सभी ज़ख़्मों के निशां
मैं देख पाता तुम्हारा चेहरा
और उस के पीछे का आदमी
और उसके पीछे के सब घाव
जिनका बस एहसास भर है मुझे
कि जिनको मैं जानता-पहचानता नहीं हूँ
फिर चाहे जान देते उस आख़री लड़ाई में
इतिहास को पराजित करने की
तुम्हारे आंगन में या मेरे सहन में, कहीं भी
बशर्ते कि दिन का उजाला हो
सूरज की नर्म धूप का साया हो
क्योंकि मैं जहाँ हूँ वहाँ
बरस भर बर्फ़बारी का मौसम रहता है।